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देश का मिज़ाज सर्वे 2025 : पीएम मोदी की धमाकेदार वापसी के पीछे क्या है वजह?

भाजपा ने 2024 के आम चुनावों में लगे झटके के बाद चुनावी लिहाज से अपनी स्थिति सुधारी और अकेले के बूते बहुमत हासिल कर लेने में सक्षम. मगर मोदी सरकार के लिए देश की अर्थव्यवस्था अब भी बनी हुई है चिंता की बड़ी वजह

पीएम मोदी/फाइल फोटो
पीएम मोदी/फाइल फोटो
अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2025

लचीलापन. यह शब्द कभी किसी जड़ वस्तु के बारे में इस्तेमाल होता कि दबाव या झटके की हालत में उसका स्वरूप लचीले गुण की वजह से नहीं बदलता. बाद के दौर में मनोविज्ञानी और समाजशास्त्री इस अवधारणा और शब्द का इस्तेमाल उन व्यक्तियों के चरित्र को बताने के लिए करने लगे जो प्रतिकूल स्थितियों का सामना दूसरों के मुकाबले बेहतर कर सकते हैं या जिनमें मुश्किल चुनौतियों, दबाव या आघात से उबरने और कहीं ज्यादा तेजी से निखरकर आने का विशेष गुण होता था.

यही वह शब्द है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झटके झेलकर भी डटे रहने और ज्यादा मजबूत होकर उभर आने की विरली क्षमता का सटीक निचोड़ प्रस्तुत करता है, जैसा कि निकट अतीत में जाहिर हुआ है. 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को करारा झटका लगा. वह कुल 543 में महज 240 सीटें जीत सकी, जो अपने दम पर सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 सीटों के साधारण बहुमत से 32 कम थीं.

मगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों के साथ हासिल कुल 293 सीटों के बल पर केंद्र में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए उसकी नैया पार लग सकी. लेकिन मोदी के लिए यह नतीजा इसलिए झटका था क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी के 350 से ज्यादा, यानी 2019 के आम चुनाव में हासिल 303 सीटों से करीब 50 ज्यादा, सीटें जीतने के लिए पूरा जोर लगा दिया था. कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन (इंडिया) ने 234 सीटें जीत लीं और कुछ वक्त के लिए लगा कि भाजपा गठबंधन की राजनीति के दबावों और बाध्यताओं की बंधक बन गई.

इसके बावजूद उस आम चुनाव के बाद वक्त के साथ कदमताल करते हुए हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में हुए तीन बड़े विधानसभा चुनाव में जीत की निर्णायक हैट्रिक लगाकर मोदी और भाजपा ने अपनी चाल-ढाल में गजब की ऊर्जा और आत्मविश्वास फिर हासिल कर लिया है. इससे ठीक विपरीत इंडिया ब्लॉक और उसके अलग-अलग घटक दलों ने भुलावे में रहकर भाजपा को राजनैतिक ताकत और अपना दबदबा फिर हासिल करने दिया. इसका असर इंडिया टुडे-सी वोटर देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण में भी झलका.

सर्वेक्षण में पार्टी के प्रति रुझान में नाटकीय बदलाव देखने को मिला है. सर्वे का अनुमान है कि अगर आज आम चुनाव होते हैं तो भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेगी और उसकी सीटों की संख्या बढ़कर 281 पर पहुंच जाने की उम्मीद है. यह 272 के साधारण बहुमत से नौ ज्यादा हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे हासिल सीटों से 41 सीटों का उछाल है. इसका नतीजा यह हो सकता है कि एनडीए की कुल सीटें 293 से बढ़कर 343 पर पहुंच जाएंगी, जिससे उसे आरामदायक बहुमत मिल जाएगा.

मोदी के कामकाज की रेटिंग में भी बीते छह महीनों में उछाल आया है. मौजूदा देश का मिज़ाज सर्वे से पता चलता है कि इस सर्वे में शामिल 61.8 फीसद लोगों ने उनके कामकाज को अच्छा या बेहतरीन आंका, जबकि अगस्त 2024 के सर्वे में ऐसा आंकने वाले 58.6 फीसद ही थे. हालांकि मोदी को 78 फीसद की सबसे ज्यादा रेटिंग अगस्त 2020 में कोविड महामारी की पहली लहर के ऐन वक्त मिली थी, लेकिन 10 साल से ज्यादा सत्ता में रहने के बाद भी 60 फीसद से ज्यादा का अनुमोदन हासिल करना कमाल का कारनामा ही हो सकता है.

2003 में जबसे इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण शुरू हुए, कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री लोकप्रियता की इतनी ऊंची रेटिंग बनाए नहीं रख सका, जितनी मोदी रख सके हैं. प्रधानमंत्री के रूप में दूसरे कार्यकाल के तीसरे साल तक मनमोहन सिंह की लोकप्रियता रसातल में पहुंच गई थी, जहां से वह फिर कभी उबर न सकी.

यहां तक कि इस सवाल पर भी कि अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए कौन सबसे उपयुक्त है, सर्वे में शामिल 51.2 फीसद या बहुसंख्य लोग मोदी को ही बनाए रखना चाहते हैं. प्रधानमंत्री अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर 26 फीसद अंकों की जबरदस्त बढ़त बनाए हुए हैं. राहुल की रेटिंग दो फीसद अंक बढ़कर 24.9 फीसद पर पहुंच गई है, जो मोटे तौर पर उनके लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता होने की बदौलत मालूम देती है.

सर्वेक्षण से यह भी सामने आया कि बहुमत (50.7 फीसद) मोदी को देश का बेहतर प्रधानमंत्री मानता है, जबकि मनमोहन सिंह 13.6 फीसद के साथ काफी पीछे दूसरे नंबर पर हैं. एनडीए सरकार के कामकाज की रेटिंग इस बात की तरफ भी इशारा करती है कि इस गठबंधन ने लोकसभा चुनाव के बाद अच्छी-खासी जमीन फिर कैसे हासिल कर ली. 62 फीसद से ज्यादा ने कहा कि वे एनडीए सरकार के कुल कामकाज से संतुष्ट या बहुत संतुष्ट हैं, जो अगस्त 2024 के देश के मिज़ाज सर्वे के मुकाबले चार फीसद अंक ज्यादा हैं.

अयोध्या में 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर के उद्घाटन के बाद श्रद्धालुओं की भीड़

अच्छे से सीखा सबक

इस तरह फरवरी 2025 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण का बड़ा संदेश यह है कि मोदी और भाजपा धमाके के साथ फिर लौट आए हैं. लगता है कि उन्होंने आम चुनाव के नतीजों से सबक सीखकर और खासकर पहले प्रदर्शित अपने अति आत्मविश्वास और अहंकार को तिलांजलि देकर यह उपलब्धि हासिल की है.

चुनाव अभियान से ठीक पहले भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने ऐलानिया कहा था कि पार्टी अब बड़ी हो गई है और चुनावी समर्थन हासिल करने के लिए उसे अपने वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की जरूरत नहीं रह गई है. वह सुर कुछ ही वक्त बाद बदल गया और इस कदर बदला कि भाजपा ने तीनों विधानसभा चुनावों में आरएसएस के साथ पूरे तालमेल से काम किया, न सिर्फ कार्यकर्ताओं को लामबंद करने में बल्कि करीने से मतदाताओं तक पहुंचने और उनका वोट हासिल करने में भी उनकी मदद ली.

इस बीच मोदी ने उस चीज के प्रति अपनी नापसंदगी पर भी यू-टर्न ले लिया, जिसे पहले उन्होंने विपक्ष की रेवड़ी की राजनीति कहकर खारिज कर दिया था. एनडीए ने महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए जबरदस्त नकद भत्ता देने का ऐलान किया और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की तरफ से दी गई कल्याण योजनाओं की बराबरी की या उससे बढ़कर मुहैया कराने का वादा किया. इन तीनों विधानसभा चुनावों के प्रचार अभियान में लोकसभा चुनाव की तरह ताबड़तोड़ बमबारी करने के बजाए मोदी ने रणनीतिक रैलियां कीं और जमीन पर प्रचार का सारा जिम्मा स्थानीय नेताओं और दूसरे राज्यों के सांगठनिक कार्यकर्ताओं पर छोड़ दिया.

राजकाज के मोर्चे पर प्रधानमंत्री मोदी ने गठबंधन राजनीति की बाध्यताओं के हिसाब से अपने को बदला और अपने दो सहयोगी दलों—बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) और आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी—की ज्यादातर प्रमुख मांगों को पूरा करते हुए उन्हें उनकी मनचाही वित्तीय सहायताएं दीं. यही उदारता हालांकि उन्होंने मंत्रालयों के बंटवारे में नहीं दिखाई, जब प्रधानमंत्री ने न केवल वित्त, गृह, विदेश मामले और रक्षा सरीखे प्रमुख मंत्रालय भाजपा के लिए रखे बल्कि अपनी मूल टीम को भी काफी-कुछ बनाए रखा. मोदी 3.0 इस लिहाज से मोदी 2.0 का ही विस्तार है. अगर पहले धारणा यह थी कि नरेंद्र मोदी के बगैर भाजपा चल नहीं सकती, तो अब धारणा यह मालूम देती है कि उनके बिना एनडीए टिक नहीं पाएगा. 

इंडिया ब्लॉक और खासकर कांग्रेस का रुख एकदम उलट दिखाई पड़ता है. आम चुनाव के बाद उनका जोश आखिरकार एक-दूसरे के खिलाफ नुक्ताचीनी में बदल गया है. इससे मौजूदा सर्वेक्षण में इंडिया ब्लॉक की सीटों की संख्या 234 से घटकर 188 पर आ जाने का अनुमान है, जो 46 सीटों की गिरावट है. इसमें सबसे ज्यादा नुक्सान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है. देश की सबसे पुरानी पार्टी की सीटें 21 घटकर 99 से 78 पर आ जा सकती हैं.

इंडिया ब्लॉक को सबसे ज्यादा नुक्सान महाराष्ट्र में होता लगता है, जहां उसने 48 में से 30 सीटें जीती थीं, जबकि एनडीए को 17 सीटें ही मिली थीं. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि एनडीए की सीटें बढ़कर 40 पर पहुंचने की संभावना है, यानी अकेले महाराष्ट्र से उसकी 23 सीटें बढ़ सकती हैं.

दूसरी जगहों की बात करें, तो राजस्थान और हरियाणा में, जहां कांग्रेस ने भाजपा की सीटों में सेंध लगाई थी, भगवा पार्टी वापसी करती दिखाई देती है. उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से महज 33 जीती थीं, उसे 11 सीटों का फायदा होने की उम्मीद है. यह पिछले साल के लोकसभा चुनाव में छह सीटें जीतने वाली कांग्रेस और 37 सीटें जीतने वाली अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की कीमत पर होगा.

राज्य में एनडीए की सीटों की संख्या बढ़कर करीब 44 पर पहुंचने की उम्मीद है, लेकिन ये 2019 में उसकी झोली में आई 64 सीटों से अब भी काफी कम हैं. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सरीखे दूसरे बड़े राज्यों में तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कलगम सरीखी क्षेत्रीय पार्टियों की मजबूत पकड़ कायम है, जहां ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन दोनों ही अपने-अपने गृह राज्यों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों की सूची में ऊंची पायदान पर आए हैं.

चेतावनी के गहरे संकेत

अलबत्ता मोदी और भाजपा ने तमाम मुश्किलों के बावजूद खासी चुनावी जमीन फिर हासिल कर ली है, देश का मिज़ाज सर्वेक्षण कुछ बड़े सरोकारों की ओर भी इशारा करता है, जिन पर वे ध्यान देंगे तो जीत का सिलसिला बनाए रखने में उनको मदद मिलेगी. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में लोगों ने मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि राम मंदिर के निर्माण को माना है, मगर उसके राजनैतिक फायदे पहले ही अपने चरम पर पहुंच चुके हैं.

इसी तरह राजनैतिक स्थिरता के वादे का उपलब्धियों की फेहरिस्त में ऊपर आना भी इसलिए वाजिब है क्योंकि इंडिया ब्लॉक को अभी अपने को सुसंगत और सही विकल्प के रूप में स्थापित करना है. मोदी सरकार के लिए असल चिंता की बात यह है कि मेक इन इंडिया, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास और कल्याणकारी योजनाओं सरीखे उनके कार्यक्रम उपलब्धियों की सूची में काफी नीचे आए हैं.

दूसरी तरफ महंगाई सबसे बड़ी नाकामियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है और उसके बाद बेरोजगारी और आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट है. सर्वेक्षण में शामिल 48 फीसद जितने ज्यादा लोग इन मुश्किलात से परेशान हैं, जिसमें बहुमत बेरोजगारी, कीमतों में वृद्धि, गरीबी और किसानों के संकट को देश के सामने मौजूद सबसे बड़ी समस्याएं मानता है.

इस मामले में लोगों की हताशा बढ़ी दिखती है कि अगले छह महीनों में अर्थव्यवस्था में सुधार आने की कोई उम्मीद है, जिसके नतीजतन मोदी के पहले दो कार्यकाल के मुकाबले कम लोग मानते हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आएगा. बदतर यह कि दो-तिहाई का मानना है कि उनके लिए अपने मौजूदा खर्चे चला पाना मुश्किल होता गया है और उनकी पारिवारिक आमदनी के अगले छह महीनों में कम होने या इतनी ही बनी रहने की संभावना है. यह धारणा भी लगातार कायम है कि मोदी सरकार बड़े कारोबारों की तरफदारी और छोटे उद्यमियों और किसानों की उपेक्षा कर रही है.

अजीब विडंबना यह है कि आर्थिक दुश्वारियों के बावजूद ज्यादातर लोगों को भरोसा है कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को संभाल लेगी. लोगों ने बजट की और खासकर मध्यवर्ग के लिए आयकर से जुड़ी रियायतों के अलावा आर्थिक वृद्धि और कृषि पर जोर दिए जाने की भी तारीफ की, हालांकि एक-चौथाई इससे इत्तेफाक नहीं रखते. लिहाजा, यह साफ है कि मोदी 3.0 के लिए क्या करना जरूरी है—अपनी ऊर्जा अन्यत्र बर्बाद करने के बजाए आर्थिक वृद्धि पर पूरा ध्यान दें. मंदिर-मस्जिद विवादों पर जोर देने और सांप्रदायिक सौहार्द के बिगड़ने पर भी लोग चिंता जाहिर करते हैं, जिसके लिए भाजपा और आरएसएस को जिम्मेदार माना गया है.

महिलाओं की सुरक्षा और लोकतंत्र के खतरे सरीखे मुद्दे भी लोगों की बेचैनी की तरफ इशारा करते हैं. मोदी सरकार का राजनैतिक मकसदों के लिए प्रवर्तन निदेशालय के कथित दुरुपयोग और न्यायिक स्वतंत्रता के ह्रास को लेकर भी लोग चिंता जाहिर करते हैं. लोग समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 के खात्मे के तो पक्ष में दिखते हैं, लेकिन बहुमत जम्मू-कश्मीर में राज्य के दर्जे की बहाली के पक्ष में है.

विदेश नीति के मामले में बहुमत का मानना है कि पड़ोसियों के साथ रिश्तों में तेज गिरावट आई है और भारत को पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान फिर शुरू करना चाहिए. जहां तक चीन की बात है, रिश्तों में आई थोड़ी-बहुत गरमाहट के बावजूद राय यह है कि कूटनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाएं और व्यापार संबंध बढ़ाएं, लेकिन सीमा सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए. हैरानी की बात यह है कि अधिकांश लोग अमेरिका से लोगों को वापस भेजने और टैरिफ को लेकर आलोचनाओं के बावजूद ट्रंप के राष्ट्रपति बनने को देश के लिए अच्छा मानते हैं.

इंडिया ब्लॉक के हक में यह है कि राष्ट्रीय जाति जनगणना को 69 फीसद लोग जरूरी और वाजिब मानते हैं. विधानसभा चुनावों में हाल के झटकों के बावजूद दो-तिहाई से ज्यादा लोगों का मानना है कि इंडिया ब्लॉक को जारी रहना चाहिए क्योंकि वे मजबूत विपक्ष चाहते हैं. कांग्रेस के गठबंधन की अगुआई करने को लेकर इंडिया ब्लॉक के साथी दलों के बीच चाहे जो खींचतान हो, ज्यादातर लोगों का मानना है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी ही भाजपा को चुनौती दे सकती है.

लोग राहुल गांधी को विपक्ष की अगुआई करने के लिए सबसे उपयुक्त नेता मानते हैं, हालांकि उनकी रेटिंग में अगस्त 2024 के सर्वेक्षण के मुकाबले आठ फीसद अंकों की गिरावट आई है. इंडिया ब्लॉक की अगुआई के मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को राहुल के नीचे आंका गया है, इसी तरह अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव को भी. विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल की रेटिंग ऊंची बनी हुई है. 49 फीसद ने उनके कामकाज को अच्छा या बेहतर बताया है. कांग्रेस की अगुआई के लिए भी 36.4 फीसद की ऊंची रेटिंग के साथ राहुल को सबसे अच्छे नेता के तौर पर देखा गया है, जबकि प्रियंका दूसरे नंबर पर और उनके बाद सचिन पायलट और मल्लिकार्जुन खड़गे हैं.

भाजपा में मोदी की रेटिंग सबसे ऊंची बनी हुई है. प्रधानमंत्री के उत्तराधिकारी के तौर पर अमित शाह अब भी योगी आदित्यनाथ से आगे हैं. मगर ये दोनों नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह चौहान से काफी आगे हैं. योगी आदित्यनाथ देश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं, लेकिन देश का मिज़ाज सर्वे के मुताबिक, उन्हें गृह राज्य में अपनी छवि में सुधार की जरूरत है.

कुल मिलाकर देश का मिज़ाज सर्वे से आम चुनाव में लगे झटके के बाद मोदी और भाजपा की वापसी की झलक मिलती है. यह उन्हें सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत करने, साहसी सुधारों की ओर कदम बढ़ाने और तेज आर्थिक वृद्धि के लिए कदम उठाने का जनादेश देता है. नेल्सन मंडेला ने कभी कहा था, ''जीवित रहने का महानतम गौरव कभी न गिरने में नहीं, बल्कि गिरने पर हर बार फिर उठ खड़े होने में है."

प्र: क्या आप भाजपा के इस आरोप से सहमत हैं कि कांग्रेस देश-विरोधी गतिविधियों के लिए जॉर्ज सोरोस से फंड लेती है?

ज्यादातर लोग भाजपा के कांग्रेस-जॉर्ज सोरोस के बीच मिलीभगत के आरोप को बकवास बताते हैं

सर्वेक्षण का तरीका

इंडिया टुडे देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण दुनिया भर में सामाजिक-आर्थिक शोध के क्षेत्र में प्रतिष्ठित सीवोटर ने किया. इसमें 2 जनवरी, 2025 और 9 फरवरी, 2025 के बीच सभी राज्यों के सभी लोकसभा क्षेत्रों से 54,418 लोगों से बातचीत की गई. इन नमूनों के अलावा सीवोटर के नियमित ट्रैकर डेटा पर पिछले 24 हफ्तों के दौरान हासिल अतिरिक्त 70,705 बातचीत का विश्लेषण किया गया, ताकि वोटों और सीटों की गणना के अनुमानों में लंबे वक्त के रुझान शामिल किए जा सकें.

इस तरह देश का मिज़ाज सर्वे की इस रिपोर्ट में कुल 1,25,123 लोगों की राय पर विचार किया गया. त्रुटि की गुंजाइश रिपोर्टिंग के लघु स्तर पर +/-3 फीसद और बड़े स्तर पर +/- 5 फीसद है और इसमें भरोसे का स्तर 95 फीसद है.

सीवोटर ट्रैकर मई 2009 से ही लगातार हर हफ्ते देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक कैलेंडर वर्ष में 52 वेव या तरंगें चलाता रहा है, जिसका नमूना आकार लक्ष्य हर तिमाही 60,000 नमूने लेना है. जवाबों की औसत दर 55 फीसद है. सीवोटर 1 जनवरी, 2019 से दैनिक आधार पर ट्रैकर चलाता आ रहा है और उससे लिए गए सात दिनों के नमूनों का उपयोग ट्रैकर विश्लेषण के लिए करता रहा है.

ये सभी सर्वेक्षण दुनिया भर में मानकीकृत पद्धति में इस्तेमाल किए जाने वाले बेतरतीब नमूना पद्धति पर आधारित हैं. नमूनों का चयन देश के सभी क्षेत्रों और आबादी की विविधता का ध्यान में रखकर प्रशिक्षित शोधकर्ताओं ने किया है. यह सर्वे सभी दायरे के वयस्क लोगों के साथ कंप्यूटर असिस्टेड टेलीफोन बातचीत (सीएटीआई) पर आधारित है. बेतरतीब आंकड़े निकालने के लिए देश के सभी टेलीकॉम सर्कल में सभी ऑपरेटरों को आवंटित फ्रीक्वेंसी सीरीज को समाहित करके स्टैंडर्ड रैंडम डिजिट डायलिंग (आरडीडी) का इस्तेमाल किया गया.

सीवोटर डेटा का सांख्यिकीय मूल्यांकन करके समुचित प्रातिनिधिक विश्लेषण करता है ताकि उसमें जनगणना के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व हो सके. डेटा का मूल्यांकन जनगणना की ज्ञात प्रोफाइल से किया जाता है, जिसमें स्त्री-पुरुष, उम्र, शिक्षा, आय, धर्म, जाति, शहरी/ग्रामीण और पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के वोट रीकॉल शामिल हैं. एनालिटिक्स के लिए सीवोटर अपने स्वामित्व वाले एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करता है, जिससे विभाजित-मतदाता परिघटना के आधार पर प्रादेशिक और क्षेत्रीय वोट हिस्सेदारी की गणना की जाती है.

सीवोटर विश्व जनमत अनुसंधान संघ की तरफ से तैयार पेशेवर नैतिकता और प्रथा संहिता और भारतीय प्रेस परिषद की तरफ से निर्देशित जनमत सर्वेक्षण संबंधित दिशानिर्देशों का पालन करता है.

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