
घरों, चौक-चौराहों पर चिपके चुनावी पोस्टरों में धूल खा रहे पार्टी के चुनाव चिह्न झाड़ू हफ्तों की राजनैतिक लामबंदी की गवाही दे रहे हैं. सप्ताहांत की शाम का वक्त है. मौके से एक खास तवारीख जुड़ी हुई है. पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी में 2014 के सांप्रदायिक दंगे में 50 लोग जख्मी हो गए थे. यहां ब्लॉक 27 मार्केट के पास एक मोहल्ला क्लिनिक है, जो राष्ट्रीय राजधानी में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) के कल्याणकारी मॉडल का एक अहम प्रतीक है. आसपास ज्यादातर घर मुसलमानों के हैं.
अलबत्ता, इस विधानसभा क्षेत्र में एक-तिहाई से ज्यादा दलित आबादी है, जिसकी वजह से यह अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित है. इसी जाति, वर्ग और समुदाय के समीकरण को आप अपना गढ़ मानती है. दिल्ली के तीन बार मुख्यमंत्री तथा आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पार्टी के खास नीले और पीले रंग में सजे मंच पर चढ़ते हैं. चारों ओर समर्थकों का सैलाब है. जनवरी की गुनगुनी सर्दियों में उनकी आवाज गूंजती है, "हम फिर सरकार बनाएंगे." बेशक, इस बार चुनौतियों को हल्के से स्वीकार करने के लहजे में वे कहते हैं, "हां, सीटें थोड़ी-सी ऊपर-नीचे हो सकती हैं."
केजरीवाल के लिए 2025 जैसी जंग पहले कभी इतनी कड़ी नहीं थी. मौजूदा विधानसभा चुनाव में आप सुप्रीमो पर ही असल फोकस है. 2013 में राजनीति के आसमान में सितारे की तरह उभरने के बाद अब बहुत कुछ बदल गया है. जो तब 'आम आदमी' का प्रतीक था, आज उसे कुछ और ही बताया जा रहा है. केजरीवाल के कई मीम और पैरोडी का साधन बन चुके ट्रेडमार्क मफलर की जगह अब गहरे हरे रंग की पफर जैकेट आ गई है, जिसे वे बताते हैं कि कोई भी चांदनी चौक में 2,500 रुपए में खरीद सकता है, लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि यह ब्रांडेड जैकेट दस गुना ज्यादा कीमत का है.

धुर विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उन पर मुख्यमंत्री आवास को ''शीश महल" में बदल डालने का भी आरोप लगा रही है. वाकई आप में आंतरिक कलह, हाई-प्रोफाइल दलबदल और उसके राजकाज मॉडल की आलोचना से उसकी नींव कुछ हिली हुई है. लिहाजा, केजरीवाल की जंग न सिर्फ विरोधियों के खिलाफ बल्कि अपने राजनैतिक अस्तित्व के लिए भी बन गई है. आप सुप्रीमो को न सिर्फ सत्ता विरोधी भावना से लड़ना है, बल्कि भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के रूप में अपनी छवि को लगे गहरे झटके से भी जूझना है.
उन्हें तगड़ा झटका प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की मार्च 2024 में कथित तौर पर करोड़ों रुपए के शराब नीति घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तारी से लगा. पहली बार किसी मुख्यमंत्री के साथ यह हुआ. पांच महीने की जेल के बाद सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली, तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और कहा, "मुझे कानूनी अदालत से इंसाफ मिला, अब मैं जनता की अदालत से इंसाफ मांगूंगा."
केजरीवाल फैक्टर
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दम पर आप 2013 में पहली बार सत्ता में आई, तो केजरीवाल आम आदमी के ऐसे मसीहा की तरह उभरे, जो देश की राजनीति से भ्रष्टाचार के दलदल को मिटा देगा. तब कांग्रेस के साथ गठबंधन में बतौर मुख्यमंत्री 49 दिनों के बाद केजरीवाल ने सख्त भ्रष्टाचार विरोधी कानून के खिलाफ प्रतिरोध का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया था. 2015 के विधानसभा चुनाव की अपनी रणनीति में उन्होंने खुद को गरीबों के मसीहा के रूप में पेश किया.
उन्होंने सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में सुधार, बिजली की प्रति यूनिट दरों को आधा करने और 20,000 लीटर पानी मुफ्त देने वगैरह का ऐलान किया. आप ने दिल्ली के चुनाव में 54 फीसद वोट शेयर के साथ दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में 67 पर जीत हासिल की. इस तरह भाजपा और कांग्रेस दोनों को धूल में मिला दिया.
दरअसल, राजनीति को साफ-सुथरी और राजकाज को अधिक जवाबदेह बनाने के केजरीवाल के पक्के इरादे से एलीट और उच्च मध्यम वर्ग तबका प्रभावित हुआ, जबकि मुफ्त सुविधाओं के जरिए एक हद तक सबको बुनियादी आय मुहैया कराने की जन-हितैषी राजनीति से निम्न मध्यम वर्ग और गरीब तबका आकर्षित हुआ. सो, 2020 के विधानसभा चुनाव में आप ने पहले से थोड़ी-सी कम 62 सीटों पर फिर जीत दर्ज की, लेकिन वोट शेयर बरकरार रखा. हालांकि लोकसभा चुनावों में भाजपा 2014 की तरह 2019 में भी दिल्ली की सभी सात संसदीय सीटें जीत चुकी थी.
हालांकि केजरीवाल की अपने राजकाज के अनूठे मॉडल को राष्ट्रीय राजधानी से परे ले जाने की कोशिश गोवा में नाकाम रही, गुजरात में कुछ हलचल पैदा की लेकिन पंजाब में मार्च 2022 के विधानसभा चुनाव में कुल 117 विधानसभा सीटों में से 92 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की, तो राष्ट्रीय राजनीति में आप की धमक बुलंदी पर पहुंच गई. अलबत्ता, उस बुलंदी के बाद, खासकर दिल्ली में आप का आभामंडल फीका पड़ने लगा, जब भाजपा उसकी बढ़ती देशव्यापी स्वीकार्यता पर अंकुश लगाने में जुट गई.
ईडी ने केजरीवाल और पूर्व उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और दोनों को जमानत मिलने से पहले कई महीने जेल में काटने पड़े. पूर्व परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत समेत कई वरिष्ठ नेता भाजपा में जा मिले. उधर, केंद्र सरकार ने मई 2023 में एक नए अध्यादेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें नौकरशाही को मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के तहत बताया गया था.
उप-राज्यपाल को सारे अधिकार सौंप दिए गए. सितंबर 2024 में केजरीवाल के इस्तीफे के बाद ऑक्सफोर्ड में पढ़ीं एक्टिविस्ट तथा कैबिनेट मंत्री आतिशी मार्लेना मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन बड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई से राजकाज पर भारी असर पड़ा, जिसकी कीमत उसे चुकानी पड़ सकती है.
आप का गरीब गढ़
दिल्ली के चुनावी इतिहास में भारी बदलाव देखने को मिलते हैं. विधानसभा चुनावों में मतदाता आप को एकमुश्त समर्थन दे देते हैं तो लोकसभा चुनावों में भाजपा को बढ़त मिल जाती है. दिल्ली के करीब 30 फीसद मतदाता स्थानीय और संसदीय चुनावों में अपना रुख बदल देते हैं. लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए 15 फीसद और राज्य चुनावों में आप के लिए 30 फीसद मतदाताओं का रुझान बदल जाता है. चुनाव पंडित इस विधानसभा चुनाव में आप और भाजपा के बीच दोतरफा मुकाबला बता रहे हैं, जिसमें आप को शुरुआत में बढ़त है.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में लोकनीति कार्यक्रम के सह-निदेशक संजय कुमार कहते हैं, "2025 का दिल्ली चुनाव 2020 के चुनाव से काफी अलग होगा. पिछले चुनाव में आप को समाज के सभी तबकों से अलग-अलग अनुपात में वोट मिले थे. सभी तबकों में केजरीवाल और उनके नेतृत्व के प्रति उत्साह साफ दिख रहा था. लेकिन 2025 में मध्यम वर्ग का केजरीवाल से मोहभंग होता दिख रहा है. इसलिए जीत के लिए उन्हें निम्न मध्यम वर्ग और गरीब तबके के अलावा अल्पसंख्यकों पर अपनी पकड़ बनाए रखनी होगी."
सी-वोटर के संस्थापक-निदेशक यशवंत देशमुख उनसे सहमत हैं. वे कहते हैं, "भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के रूप में केजरीवाल की छवि धूमिल हुई है. हमारे ट्रैकर में उनकी लोकप्रियता रेटिंग भी उनके निकटतम मुख्यमंत्री पद के प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले 60 फीसद की ऊंचाई से गिरकर करीब 48 फीसद पर आ गई है. यानी 12 फीसद अंकों की गिरावट है." लेकिन वे आगे कहते हैं, ''रेटिंग अभी भी काफी ऊपर है और केजरीवाल बढ़त बनाए हुए हैं." इसके बावजूद, देशमुख कहते हैं, ''पिछले दो चुनावों की तरह इस बार मामला आप के लिए एकतरफा नहीं होगा."
पिछले दो चुनावों के सीएसडीएस के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि आप को निम्न मध्य वर्ग और गरीब तबके के करीब 68 फीसद वोट मिलते हैं. ये तबके दिल्ली की तकरीबन 3.4 करोड़ आबादी में 60 फीसद से ज्यादा हैं और चुनाव नतीजों का रुख मोड़ने की ताकत रखते हैं. केजरीवाल ने पिछले दो बार के शासन में बड़ी सावधानी से इस मतदाता आधार को तैयार किया है. प्रवासी लोगों की बहुलता वाले शहर में मुफ्त सरकारी सुविधाओं के जरिए बनाया यह ऐसा वोटर आधार है, जो जाति और धर्म से परे है.
केजरीवाल ने उन्हें मुफ्त बिजली-पानी, सरकारी स्कूलों में मुफ्त उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, अस्पतालों और मोहल्ला क्लिनिकों का विस्तार, सभी के लिए मुफ्त इलाज तथा दवा, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ्त तीर्थ यात्रा जैसी योजनाओं का लाभ मुहैया कराया है. कुल मिलाकर, केजरीवाल का अनुमान है कि इससे हर परिवार को इन कल्याणकारी योजनाओं से करीब 25,000 रुपए की बचत होती है.
विरोधी उनके इस आंकड़े को सही नहीं मानते, लेकिन वे यह तो मानते हैं कि 5,000 रुपए की बचत है, जो कम कतई नहीं है. दिल्ली के रामजस कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर तनवीर एजाज कहते हैं, "दूसरे राजनैतिक दल जिसे मुफ्त कहते हैं, उससे आखिरकार निम्न मध्यम वर्ग को कुछ बचत होती है. इसी से केजरीवाल का वह समर्थन आधार बना हुआ है और कोई वजह नहीं दिखती कि उस समर्थन आधार में कोई बड़ा फेरबदल हो."
महिला मतदाता
केजरीवाल के चुनावी समीकरण के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण महिला मतदाता ही हैं, जो दिल्ली के कुल मतदाताओं में करीब 46 फीसद हिस्सेदारी रखती हैं. मुफ्त सार्वजनिक परिवहन जैसी लक्षित कल्याणकारी योजनाओं ने आप को महिलाओं के बीच लोकप्रिय बना दिया है. 34 वर्षीया नजमा खातून को ही लीजिए, जो चिराग दिल्ली के शहरी गांव की निवासी हैं. यह इलाका कड़ी मेहनत करके अपने सपनों को पूरा करने में जुटे लोगों का है. कोविड-19 के कारण फैक्टरी में काम करने वाले उनके पति की नौकरी चली गई तो परिवार की वित्तीय स्थिति पूरी तरह डगमगा गई.
कठिन चुनौतियों से जूझती नजमा के लिए मुफ्त बस की सवारी जीवन रेखा साबित हुई. घरेलू सहायिका के तौर पर काम करके किसी तरह अपने परिवार का खर्च चला रहीं नजमा कहती हैं, "हर महीने आठ सौ रुपए की बचत होती है. यह हमारे लिए काफी मायने रखती है. हम उन्हें वोट क्यों नहीं देंगे?"

मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर जिले के रहने वाले मनोज कुमार इलेक्ट्रिक ऑटो चलाते हैं. यह आप सरकार की इलेक्ट्रिक ऑटो योजना के तहत उनकी पत्नी के नाम पर मिला है. वे कहते हैं, "इस बार भाजपा के पक्ष में माहौल तो दिख रहा है. लेकिन जहां तक मेरी बात है, मैं तो केजरीवाल को ही वोट दूंगा."
मूल रूप से पश्चिम बंगाल के माल्दा की रहने वाली और अभी नेहरू प्लेस में कार्यालय सहायिका का काम करने वाली कृष्णा दास के लिए दिल्ली के सरकारी स्कूलों की बदली सूरत एक अभिभावक के तौर पर बहुत मायने रखती है. बतौर माता-पिता स्कूलों में मिलने वाले सम्मान को लेकर वे कहती हैं, "केजरीवाल के आने से पहले तो शिक्षक हमारे साथ अभिभावक जैसा व्यवहार ही नहीं करते थे. अब मुझे स्कूल बुलाकर शिक्षक के साथ बैठने और अपने बेटे की पढ़ाई-लिखाई के बारे में बात करने का मौका दिया जाता है. यह बड़ी बात है."
2025 के चुनाव में आप को निर्णायक बढ़त दिलाने के इरादे से केजरीवाल ने पिछले वर्ष दिल्ली बजट में घोषित 18 वर्ष से अधिक उम्र की हर महिला को 1,000 रुपए का मासिक मानदेय राशि को अब दोगुनी करके 2,100 रुपए कर दिया है. देशमुख कहते हैं, ''पुरुष मतदाताओं की बात करें तो आप और भाजपा के बीच मुकाबला बराबरी का नजर आता है. लेकिन महिला मतदाताओं के मामले में आप भाजपा से कम से कम आठ फीसद अंकों से आगे है. यह निर्णायक साबित हो सकता है."
लेकिन केजरीवाल की लोक-लुभावनी योजनाओं का लाभ केवल महिलाओं तक सीमित नहीं. वे छात्रों को मुफ्त बस यात्रा और मेट्रो टिकटों में 50 फीसद छूट का वादा करके युवा मतदाताओं को भी लुभा रहे हैं. बुजुर्गों के लिए वे संजीवनी योजना शुरू करेंगे, जिससे 60 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों को सरकारी और निजी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा मिलेगी.
लुभावनी घोषणाओं के साथ केजरीवाल अपनी रैलियों में लोगों से यह कहकर भाजपा के खिलाफ डरा भी रहे हैं कि सत्ता में आने पर वे इन सबको वापस ले लेंगे. द्वारका की सघन आबादी वाली कॉलोनी में जनसभा के दौरान उन्होंने कहा, ''आप गलत बटन दबाते हैं, तो वे आपकी मुफ्त स्कूल, मुफ्त चिकित्सा उपचार, मुफ्त बस यात्रा, मुफ्त पानी-बिजली की सुविधा छीन लेंगे. आप गलती से भी गलत बटन न दबाना."
द्वारका में उनको सुनने वाली इस भीड़ में बड़ी संख्या में पहली बार मतदान करने वाले युवा, मध्यम आयु वर्ग के श्रमिक वर्ग के लोग, बुजुर्ग निवासी और बड़ी 'आम आदमी’ वाली टोपी पहने महिलाएं मौजूद थीं. केजरीवाल की नुक्कड़ सभाओं में ऐसा नजारा आम है. पार्टी हमेशा से ही भाजपा की मेगा रैलियों की तुलना से ज्यादा प्रभावी मानती है.
आक्रामक भगवा रणनीति
भाजपा ने उम्मीदवार चयन में एकदम आक्रामक रणनीति अपनाते हुए अपने प्रमुख नेताओं को मैदान में उतारा है. दो बार के सांसद प्रवेश वर्मा को नई दिल्ली में केजरीवाल के खिलाफ और रमेश बिधूड़ी को कालकाजी में आतिशी के खिलाफ उतारकर पार्टी ने आप के गढ़ों को चुनौती देने के इरादे साफ कर दिए हैं. पूरे आत्मविश्वास के साथ अंसारी नगर एम्स परिसर में प्रचार करते प्रवेश वर्मा कहते हैं, "कोई लड़ाई नहीं है."
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और जाट नेता साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश चुनाव मैदान में सीधे केजरीवाल को चुनौती दे रहे हैं और माना जा रहा है कि अगर उनकी पार्टी जीती तो वे मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे होंगे. यह ऐसा चुनाव है जहां भाजपा ने अपनी पुरानी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा पेश नहीं किया है. प्रवेश वर्मा स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ घर-घर जाकर अंसारी नगर निवासियों से कहते हैं, "आशीर्वाद दीजिए." पार्टी कार्यकर्ता चलते-चलते केजरीवाल के पोस्टर फाड़ देते हैं और उनकी जगह वर्मा के पोस्टर लगा देते हैं.
ढोल-नगाड़ों की आवाज और नारों से शाम का सन्नाटा टूटता है, और आवाज सुनकर महिलाएं खिड़की-बालकनी से झांकने लगती हैं. प्रवेश वर्मा हाथ हिलाकर उन सबका अभिवादन करते हैं. विंडसर प्लेस स्थित उनके घर के प्रवेश द्वार पर केजरीवाल का एक कटआउट लगाया गया है, जिस पर मजाक उड़ाने के अंदाज में लिखा है, "मुझे वोट मत देना, मैं यमुना को साफ करने में नाकाम रहा." वर्मा कहते हैं, "मैं इस कटआउट को यमुना में विसर्जित कर दूंगा" और अगले दिन उन्होंने ऐसा ही किया.
भाजपा पूरी उम्मीद के साथ केजरीवाल के मूल जनाधार में सेंध लगाने की कवायद में जुटी है. इसीलिए वह झुग्गी-झोपड़ियों और मलिन बस्तियों जैसे निम्न मध्य वर्ग के क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थानीय इकाइयां पहले ही सक्रिय हो चुकी हैं. 675 मलिन बस्तियों और 1,700 से ज्यादा झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले मतदाताओं की संख्या करीब 15 लाख है जो कुल वोट में 10 फीसद हिस्सेदारी रखती हैं.
दिल्ली में लोकनीति-सीएसडीएस के मतदान बाद सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 2020 के चुनाव में 61 फीसद सबसे गरीब लोगों ने आप को वोट दिया था. भाजपा ने इन क्षेत्रों में घर-घर जाकर सभी मतदाताओं से अपील करने के लिए आरएसएस की टीमें भेजी हैं. पार्टी इन क्षेत्रों से 15-20 फीसद वोट हासिल करने की कोशिश कर रही है. यह मध्य वर्ग के मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में भी जुटी है, जो कुल मतदाताओं में 45 फीसद हैं.
मध्य वर्ग के मतदाता, खासकर संपन्न कॉलोनियों के निवासी सड़कों की खराब गुणवत्ता, कूड़ा-कचरा जमा रहने और यमुना की सफाई न होने जैसे मुद्दों पर केजरीवाल से नाराज हैं. ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर भाजपा लगातार आप सरकार को घेरती रही है.
दुविधा में घिरी कांग्रेस
2025 का दिल्ली चुनाव कांग्रेस के लिए बहुत ज्यादा मायने रखता है, खासकर हरियाणा और महाराष्ट्र में हाल में करारी हार के बाद यह चुनाव और भी ज्यादा अहम हो गया है. दिल्ली में कांग्रेस का फिर से उभरना न केवल पार्टी के पुनरुद्धार के लिए जरूरी है, बल्कि एक मजबूत विपक्ष के तौर पर दबदबा बनाए रखने के लिहाज से भी काफी मायने रखता है. विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के भीतर कांग्रेस की प्रासंगिकता को लेकर उठते सवालों के बीच इस चुनाव में तो पार्टी की प्रतिष्ठा ही दांव पर लगी है.

1998 से 2013 तक शीला दीक्षित के नेतृत्व में लगातार तीन बार निर्विवाद रूप से दिल्ली पर काबिज रही पार्टी उसके बाद से कभी खुद को खड़ा नहीं कर पाई. पिछले तीन विधानसभा चुनाव में तो स्थिति बेहद खराब रही, जिसमें 2015 और 2020 दोनों में कांग्रेस एक भी सीट जीतने में नाकाम रही. पार्टी का वोट शेयर 2015 में 9.68 फीसद और 2020 में मात्र 4.26 फीसद रहा.
नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से केजरीवाल के खिलाफ मैदान में उतरे कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित अक्सर अपने चुनाव अभियान के दौरान शीला दीक्षित सरकार के समय का हवाला देते हैं, और इसे विकास के लिए आदर्श शासन के तौर पर चित्रित करते हैं.
वे कहते हैं, "लोग अब तक याद करते हैं कि शीला दीक्षित के समय स्थिति कितनी अच्छी थी." निर्वाचन क्षेत्र में घर-घर जाकर प्रचार करने के एक अभियान के दौरान दीक्षित के साथ बस गिने-चुने पार्टी सहयोगी ही नजर आए. उनके उत्साह दिखाने के बावजूद निराशाजनक अभियान की तस्वीर किसी से छिपी नहीं रही. यह कमी ऊर्जा और भीड़ की मौजूदगी दोनों में स्पष्ट तौर पर खल रही थी.
उनका दावा है कि लोग मौजूदा स्थिति से निराश हैं. दीक्षित इस पर जोर देते हैं कि 'लोग बदलाव चाहते हैं.’ कांग्रेस भी मुफ्त वाली लोक-लुभावनी घोषणाएं करने में पीछे नहीं रही है. कांग्रेस पर भाजपा की 'बी-टीम’ होने के आरोपों की संदीप दीक्षित कोई ज्यादा परवाह नहीं करते. उल्टे यह सवाल करते हैं, "क्या हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात में आप भाजपा की बी-टीम थी?"
इंडिया ब्लॉक में बिखराव
इंडिया ब्लॉक का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस और आप ने दिल्ली में अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया. इससे त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बनी, जिसमें भाजपा तीसरी बड़ी दावेदार है. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) जैसे इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों ने आप का समर्थन किया है, जिससे कांग्रेस के लिए अस्तित्व का संकट गहरा गया है. अब खराब प्रदर्शन की स्थिति में गठबंधन के भीतर उसका प्रभाव और भी घट सकता है. यही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर साख कमजोर होने का भी खतरा बना हुआ है.
आप से नाता तोड़ने का फैसला कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है, जो दिल्ली में वापसी के लिए आप के हाथों गंवाए मूल जनाधार की वापसी को जरूरी मानती है. दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में आप के साथ गठबंधन को बड़ी गलती बताते हुए कहा, "अगर हमने 2013 में गठबंधन न किया होता तो हमारी स्थिति इतनी खराब नहीं होती. 2024 का फैसला और बड़ी गलती थी, हमें इसकी कीमत चुकानी पड़ी है."
कांग्रेस नेता अपने रुख को सही ठहराने के लिए पिछले अनुभवों का हवाला भी देते हैं. कांग्रेस के कोषाध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन का कहना है, "गुजरात, गोवा, दिल्ली और पंजाब में हमारी राज्य इकाइयों के वरिष्ठ नेताओं ने आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी गठबंधन का कड़ा विरोध किया है. उन्होंने खुद देखा है कि कैसे आप परोक्ष रूप से भाजपा की मदद करती है."
मुस्लिम-दलित वोट
आंतरिक तौर पर कांग्रेस के सामने चुनौतियां और अवसर दोनों हैं. कमजोर जमीनी नेटवर्क और गुटबाजी एक बड़ी बाधा बनी हुई है लेकिन पार्टी मजबूत स्थिति वाली करीब 20 सीटों पर उम्मीदवार-केंद्रित अभियानों के जरिए मुस्लिम-दलित वोटों को एक साथ साधने की रणनीति पर ध्यान केंद्रित कर रही है. दिल्ली की आबादी में 12.9 फीसद मुस्लिम सात निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका में हैं और 15 अन्य में बड़ी ताकत बने हुए हैं.
आप की जमीनी पैठ और धर्मनिरपेक्ष रुख मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करता रहा है. पार्टी ने 2020 के विधानसभा चुनाव में उस इलाके की सभी छह सीटें हासिल की थीं. नरम हिंदुत्व की ओर हल्के झुकाव के बावजूद 2020 में 69 फीसद मुसलमानों ने आप का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस को केवल 15 फीसद वोट ही मिले.
अरविंद केजरीवाल के हनुमान चालीसा पढ़ने और अयोध्या में राम मंदिर का समर्थन करने जैसे उदाहरणों को कांग्रेस की तरफ से आप के 'नरम हिंदुत्व’ वाले नजरिए के तौर पर पेश किया जा रहा है. पार्टी इसे वैचारिक सिद्धांतों से समझौता भी बता रही है. कांग्रेस का तर्क है कि इन सब बातों ने आप के प्रति अल्पसंख्यकों के भरोसे को तोड़ दिया है.
हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस के पास यह मुस्लिम समर्थन हासिल करने का मौका है लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों की राय है कि अगर भाजपा अपना अभियान तेज करती है तो मुस्लिम मतदाता रणनीतिक रूप से आप के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं.
राजनैतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी कहते हैं, "चुनाव नजदीक आते-आते आप कांग्रेस को अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों का बिखराव करने वाली ऐसी पार्टी बताने पर जोर दे सकती है जो अनजाने में ही भाजपा के एजेंडे की मददगार बन रही है. आप ने व्हाट्सऐप ग्रुपों के जरिए इस नैरेटिव को हवा देना तेज कर दिया है."
दिल्ली की आबादी में 16.7 फीसद हिस्सेदारी वाले दलित भी निर्णायक मतदाता वर्ग हैं. हमेशा कांग्रेस के प्रति निष्ठावान रहे दलितों ने हालिया वर्षों में मुफ्त बिजली-पानी जैसी कल्याणकारी योजनाओं के कारण आप का दामन थाम लिया. आप ने 2015 और 2020 में दलित बहुल सभी 12 सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर 3.97 फीसद रह गया.
कांग्रेस अब उनकी शिकायतें दूर करके अधिक प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं जैसे ठोस लाभों का वादा करके दलितों को अपने खेमे में वापस लाने की कोशिशों में जुटी है. कांग्रेस को दलितों अधिकारों की रक्षक बताकर राहुल गांधी का संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा पर पूरा जोर देना दलित मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश का ही हिस्सा है.
मॉडल की लड़ाई
कांग्रेस ने अपना प्रचार अभियान आप सरकार की तीखी आलोचना के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है, जिसमें 'शराब घोटाले’ में कथित भ्रष्टाचार और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा ध्वस्त होने जैसे मुद्दों को उछाला जा रहा है. राहुल गांधी सोशल मीडिया के जरिए दिल्ली में कूड़े के बढ़ते ढेर जैसी समस्याओं पर लोगों का ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं. वे केजरीवाल के दिल्ली को 'पेरिस’ बनाने का दावे पर भी चुटकी लेते हैं. केजरीवाल के लिए मुख्यमंत्री आवास को आलीशान घर में तब्दील करने से जुड़े 'शीश महल’ विवाद पर भी कांग्रेस हमलावर है.
पार्टी ने दिल्ली में आर्थिक और सामाजिक असमानता दूर करने के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं का वादा किया है, और इन्हें रोजमर्रा की कठिनाइयों के समाधान के तौर पर सामने रखा है. लोगों के बीच पैठ बनाने की कोशिश के तहत कांग्रेस ने पूरी दिल्ली में गारंटी कार्ड बांटने की योजना बनाई है. उसकी यह रणनीति कर्नाटक में काफी सफल रही थी.
हालांकि, केजरीवाल भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए कड़ी चुनौती बने हुए हैं. आप संयोजक इस बात को सिरे से नकारते हैं कि उनके लिए यह चुनाव राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई है. इसके बजाए, केजरीवाल का कहना है कि दिल्ली के मतदाताओं को शासन के दो मॉडल में से एक को चुनने को कहा जा रहा है. इसमें एक मॉडल आप वाला है, जिसमें राज्य या राष्ट्रीय वित्त और संसाधनों को आम लोगों खासकर वंचितों में समान रूप से वितरित करने पर जोर दिया जाता है.
दूसरी तरफ भाजपा का मॉडल बड़े व्यवसायियों और अरबपतियों पर केंद्रित है. केजरीवाल पहले भी इसी नैरेटिव के साथ शानदार सफलता हासिल कर चुके हैं. अब यह तो 8 फरवरी को आने वाले नतीजे ही बताएंगे कि आने वाले समय में यह रणनीति उनके कितने काम आने वाली है.
— अभिषेक जी. दस्तीदार. (साथ में अनिलेश एस. महाजन, कौशिक डेका और हिमांशु शेखर)
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आप का गेमप्लान
पार्टी की चुनावी रणनीति की कुछ खास बातें
● सबके लिए कुछ न कुछ: महिलाओं, युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों से लेकर ऑटो-रिक्शा ड्राइवरों, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों और सफाई कर्मचारियों से लेकर 'पूर्वांचलियों’ तथा दलितों के लिए कल्याणकारी योजनाओं से लाभ.
● केंद्रित कैंपेन: निरंतर, व्यापक, घर-घर जाकर चुनाव प्रचार, पदयात्रा, रैली और रोडशो के जरिए बेहद कम अंतर (
● भाजपा की कमियों को उजागर करना: उनमें से एक है सीएम के चेहरे की कमी. नौकरियों, टैक्स स्लैब से लेकर जीएसटी को लेकर भाजपा की सियासी दिक्कतों को उजागर करने के लिए केंद्रीय बजट का हवाला देना.
● कोई स्पष्ट मुस्लिम संदेश नहीं: उसकी जगह, 'हनुमान चालीसा’ के पाठ से लेकर मंदिरों में जाने तक, नरम हिंदुत्व को दिखाना.
● डेटा एनालिटिक्स: प्रचार-अभियान की रणनीतियों को ठीक करने के लिए जमीनी सर्वेक्षण और रिपोर्टों का इस्तेमाल किया गया. जमीनी सर्वेक्षणों के आधार पर, अभियान के दूसरे भाग में मध्यवर्गीय मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया.
● मल्टीमीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल: फिल्मों से लेकर किताबों और सोशल मीडिया तक, विपक्ष के लिकरगेट या शीश महल सरीखे आरोपों को ध्वस्त करने का प्रयास करना, आम आदमी पार्टी के प्रमुख कल्याण कार्यक्रमों पर जोर देना.
भाजपा का दांव
भाजपा का ध्यान अरविंद केजरीवाल की नाकामियों को उजागर करने, अपने कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने और सत्ता-विरोधी वोटों को अपने पाले में करने पर है
● आप और केजरीवाल पर भ्रष्ट होने का ठप्पा लगाना: पार्टी को 'आप-दा’ और 'अवैध आमदनी वाली पार्टी’ बताने के साथ-साथ 'लिकरगेट’ और 'शीश महल’ का मुद्दा उठाकर भाजपा केजरीवाल को भ्रष्ट बता रही है और आप पर कुशासन का आरोप लगा रही है. वह सड़कों की हालत, सीवरेज, यमुना की सफाई सरीखे कुछ खास समस्याओं को भी उजागर कर रही है.
● मुफ्त की रेवड़ियों पर रेवड़ियां: भाजपा मौजूदा कल्याणकारी लाभों के वितरण तंत्र में सुधार करने का वादा करते हुए समानांतर कल्याणकारी योजनाओं का भी ऐलान कर रही.
● संघ के तंत्र की तैनाती: आरएसएस के पांच कार्यकर्ताओं की हर टीम मतदाताओं से संपर्क कर रही, नियमित तौर पर 25 के समूहों में उनसे मिल रही है. उसके जमीनी कार्यकर्ता भी यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उनके समर्थक 5 फरवरी को मतदान करने आएं.
● स्थानीय राय को तवज्जो देना: रामवीर सिंह बिधूड़ी, प्रवेश वर्मा, बांसुरी स्वराज, योगेंद्र चंदोलिया और मनोज तिवारी सरीखे स्थानीय क्षत्रपों को टिकट बंटवारे में काफी अधिकार देना. आरएसएस कार्यकर्ता भी विद्रोहियों और टिकट बंटवारे से नाराज लोगों को मनाने के लिए काफी मेहनत कर रहे.
● ध्रुवीकरण के एजेंडे से बचना: भाजपा नेतृत्व इसको लेकर सतर्क है कि वह सांप्रदायिक मसले आगे नहीं बढ़ाए ताकि मुस्लिम वोट एकजुट न हो.
● कांग्रेस से भी आस: भाजपा को उम्मीद है कि उसकी प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय पार्टी मुस्लिम और झुग्गी/झोपड़ी (जेजे) समूह के वोट को विभाजित करेगी, जो उसके लिए फायदेमंद होगा.
कांग्रेस की वापसी की रणनीति
दिल्ली चुनाव को लेकर कांग्रेस की रणनीति मुस्लिम और दलित वोटों को फिर से हासिल करने, आम आदमी पार्टी की शासन व्यवस्था पर हमला करने, लक्षित कल्याण योजनाओं को पेश करने और रणनीतिक उम्मीदवारों को मैदान में उतारे पर केंद्रित है
● मतदाता आधार को फिर से तैयार करना: कांग्रेस का मकसद गहन-प्रचार अभियानों के जरिए खोए हुए मुस्लिम और दलित समर्थन को फिर से हासिल करना है. इस प्रक्रिया में अल्पसंख्यक कल्याण, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के प्रति ऐतिहासिक प्रतिबद्धताओं पर जोर देना और इन मामलों में आप की कथित नाकामियों को उजागर करना शामिल है.
● एकला चलो रे: आप के साथ गठजोड़ तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने की योजना पार्टी के मतदाता आधार को फिर से हासिल करने की योजना है. प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों पर जोर देना और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाना तथा नई ऊर्जा भरना.
● लक्षित मुफ्त की रेवड़ियां: प्यारी दीदी योजना और जीवन रक्षा सरीखे कल्याण कार्यक्रम, लक्षित वित्तीय और स्वास्थ्य संबंधी लाभ, दिल्ली के मतदाताओं को लुभाने के लिए कांग्रेस के वादों के आधार हैं.
● भ्रष्टाचार को लेकर आप पर हमला: कांग्रेस 'लिकरगेट’ स्कैंडल और, 'शीश महल’ सरीखे विवादों और संसाधानों के कुप्रबंधन के आरोपों को हवा देकर आप की शासन के नैरेटिव को ध्वस्त करने तथा उसकी विश्वसनीयता को चुनौती देने की कोशिश कर रही.
● उम्मीदवारों का रणनीतिक चयन: उम्मीदवारों का जल्दी ऐलान करके, अनुभवी नेताओं को मैदान में उतार कर और बागियों को शामिल करके कांग्रेस ने अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की. हालांकि इनको लेकर पार्टी के भीतर असंतोष से नुक्सान भी हो सकता है.