
साल था 2001. भारत में उदारीकरण को लगभग 10 साल हो गए थे और नई सदी का आगाज हो चुका था. 'देखो टू थाउजैंड जमाना आ गया' गीत के साथ 10 अगस्त को एक फिल्म रिलीज हुई - 'दिल चाहता है.' 'गोवा ट्रिप', 'तीन दोस्त', 'रोड ट्रिप' जैसे कीवर्ड्स के साथ इस फिल्म ने राजदूत, बुलेट और जावा जैसी क्रूजर बाइक चलाने वाले भारतीयों को हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल दिखाई.
गूगल बाबा की मानें तो 'दिल चाहता है' फिल्म में ही पहली बार इस अमेरिकी बाइक को किसी भारतीय फिल्म में जगह मिली थी. यही हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल फिलहाल भारत-अमेरिकी संबंधों में एक रेफरेन्स पॉइंट बनकर उभरी है. खबर है कि 2 अप्रैल से भारत सरकार अमेरिकी दवाइयों, बर्बन व्हिस्की के साथ ही हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल पर भी इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने वाली है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शपथ लेने के कुछ दिनों में ही भारत से इम्पोर्ट होने वाले सामान पर टैरिफ बढ़ाने की बात की थी. अब दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को मजबूत करने के लिए भारत सरकार ने इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने का निर्णय लिया है. लेकिन अमेरिका में कल्ट स्टेटस हासिल कर चुकी इस मोटरसाइकिल की बिक्री भारत में अच्छी क्यों नहीं रही? हालांकि, ट्रंप ने इसके लिए भारतीय टैरिफ को जिम्मेदार ठहराया है, मगर क्या वाकई ऐसा है?
जब दो दोस्तों का नाम दुनिया के सबसे बड़े ब्रांड में शुमार हो गया
19वीं सदी का नौवां दशक चल रहा था. एक शाम दो दोस्त अमेरिकी अभिनेत्री और परफ़ॉर्मर एना हेल्ड का एक शो देखने गए. शो तो सबने देखा, तालियां बजाईं मगर इन दोस्तों को स्टेज पर दिखी एक तीन पहियों वाली गाड़ी जो उस शो का एक प्रॉप थी. एना को पता नहीं था कि मंच पर की गई वह छोटी सी सवारी, ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग के इतिहास में क्रांति ला देगी.

उस रात दर्शकों में मौजूद उन दो दोस्तों ने ही हार्ले-डेविडसन की शुरुआत की थी: विलियम एस. हार्ले और आर्थर डेविडसन.

हार्ले और डेविडसन ने उस थिएटर नाइट के बाद साइकिल पर सिंगल-सिलेंडर इंजन के साथ प्रयोग करना शुरू किया. ओले एविन्रूड और हेनरी मेल्क जैसे जैसे कुछ इंजीनियर दोस्तों ने भी मोटरसाइकिल डेवलप करने में मदद की. उनके शुरुआती बाइक इंजन डिज़ाइन कम शक्ति वाले थे, लेकिन 1903 तक, उन्होंने इंजन और फ़्रेम को नया रूप दिया. मशीनों की अच्छी जानकारी रखने वाले आर्थर डेविडसन के भाई वाल्टर भी इस प्रोजेक्ट में हार्ले और डेविडसन के साथ हो गए और उनकी एक्सपर्टीज से डिज़ाइन को बेहतर बनाने में मदद मिली.
1903 में हार्ले-डेविडसन कंपनी की आधिकारिक रूप से स्थापना की गई और पहला कारखाना डेविडसन के पिता के घर के बैकयार्ड में एक छोटा लकड़ी का शेड बना. यह पहली हार्ले-डेविडसन फैक्ट्री थी और यहीं पर कंपनी ने अपनी पहली मोटरसाइकिल वहीं रहने वाले अपने दोस्त हेनरी मेयर को बेची.

फिर कंपनी और कारखाने दोनों का विस्तार हुआ और 1913 तक, कंपनी ने बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए एक अत्याधुनिक कारखाना बनाया. इसके लिए जमीन खरीदने के लिए डेविडसन के चाचा ने कंपनी को 170 डॉलर का कर्ज दिया. शिकागो के एक व्यवसायी कार्ल एच. लैंग हार्ले-डेविडसन के पहले डीलर बने. दोनों दोस्तों को समझ आ गया था कि अगर बाइक को और पॉपुलर बनाना है तो अच्छी मोटरसाइकिल बनाने के अलावा कुछ और भी करना होगा.
शुरुआत में रेसिंग को लेकर झिझक के बावजूद, हार्ले-डेविडसन ने रेसिंग के क्षेत्र में कदम रखा और जल्दी ही अपनी फैक्ट्री-समर्थित टीम, 'व्रेकिंग क्रू' के साथ रेस में नंबर वन आई. किसी दूसरे अमेरिकी ब्रांड से अलग हार्ले-डेविडसन अब अमेरिकन ड्रीम, स्वतंत्रता और ताकत का प्रतीक बन गई थी. ट्रंप ने खुद एक बार 125 साल पुरानी इस मोटरसाइकिल कंपनी को 'मेड इन अमेरिका' का प्रतीक कहा था. हार्ले-डेविडसन का नाम अब अमेरिका में तो फैल चुका था, मगर यह कंपनी 'ग्लोबल' कैसे बनी?
जर्मन समाजशास्त्री और उपभोक्तावाद पर शोध करने वाले काई-उवे हेलमैन ने जर्मन अख़बार हैंडल्सब्लाट को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध और वियतनाम युद्ध के बाद, मोटरसाइकिल अक्सर उन पुरुषों की पसंद बन गई जो अमेरिकी समाज में हाशिए पर महसूस करते थे. उसी दौर में हार्ले अमेरिकी मूल्यों और एक अपने मन की करने वाली जीवन शैली के मिश्रण का प्रतीक बनकर उभर रही थी. इस मोटरसाइकिल कंपनी ने खुद को अमेरिका की बाइकर गैंग्स का एक अहम हिस्सा बना लिया था. आप आज भी अमेरिकी फिल्मों में 10-12 की संख्या में हारले-डेविडसन बाइक पर सवार पुरुषों को 'कूल' होने के एक प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. साल 1968 में आई हॉलीवुड फिल्म 'इजी राइडर' ने भी हार्ले-डेविडसन की लोकप्रियता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. मजेदार बात है कि इस फिल्म के एक्टर जैक निकोल्सन बी-ग्रेड फिल्मों में काम करते थे मगर 'इजी राइडर' करने के बाद वे एक स्थापित अभिनेता बन गए.

साथ ही हार्ले-डेविडसन को दुनिया की सबसे महंगी मोटरसाइकिलों में से एक के रूप में जाना जाता है, खासकर इसके रखरखाव के मामले में. जर्मन न्यूज़ एजेंसी डॉयचे वेले के अपने लेख में सिल्के वुन्श लिखती हैं, "दरअसल यह प्रसिद्ध मोटरसाइकिल (हार्ले) इतनी महंगी है कि इसके अधिकांश खरीदार अमीर बूढ़े पुरुष होते हैं. काम के बाद, वे अपनी जज की ड्रैस और सर्जिकल गाउन उतार देते हैं, अपने बाइकर लेदर पहनते हैं और उपनगरों में घूमने के लिए अपने 'फैट बॉयज़' को गैरेज से बाहर निकालते हैं. अपनी जानी-पहचानी गड़गड़ाहट पैदा करते हुए, मोटरसाइकिलें अपने मालिकों को सूर्यास्त की ओर अपने लोहे के घोड़ों पर सवार होकर बेताब होने का एहसास कराती हैं. यह उनके 'साफ़-सुथरे' दैनिक जीवन में थोड़ी गंदगी का भ्रम है. इसी अनुभव में चटकती मोटरों की गहरी शक्तिशाली ध्वनि इन गर्वित बाइकर्स को सशक्त बनाती है."

भारत, हार्ले-डेविडसन और टैरिफ का टंटा
साल था 2007. अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले आमों पर प्रतिबंध लगा रखा था. इधर प्रदूषण के मामले को लेकर भारत ने भी बाइक और कार कंपनियों के लिए अपने नियम कड़े कर रखे थे जिससे पूरे मोहल्ले को जगा देने वाली हार्ले-डेविडसन की मोटरसाइकिल भारतीय बाजार में प्रवेश नहीं कर पा रही थी. इसी साल भारत सरकार ने अमेरिका के साथ एक डील के तहत एमिशन और टेस्टिंग स्टैंडर्ड्स में ढील दी और यूरो III एमिशन स्टैंडर्ड्स के तहत अब 800 सीसी इंजन क्षमता या उससे अधिक की मोटरसाइकिलों का आयात किया जा सकता था. इसके बदले में अमेरिका ने भी भारत से आने वाले आमों पर से प्रतिबंध हटा लिया था.
साल 2009 में यह अमेरिकी कंपनी भारत आई और एक साल बाद बिक्री शुरू करने की घोषणा की. भारतीय बाजार में काम करने के शुरुआती दौर में हार्ले-डेविडसन ने कहा कि उसकी बाइक अमेरिका के बाहर कहीं भी मैन्युफैक्चर नहीं होगी ताकि उसकी 'मेड इन अमेरिका' साख का महत्त्व कम न हो. लेकिन बाद में कंपनी ने अपना रुख बदल दिया और 2011 की शुरुआत से उसने हरियाणा के बावल में अपनी एक असेंबली इकाई स्थापित की और इस तरह भारत में मोटरसाइकिलों को असेंबल करना शुरू कर दिया. ब्राजील के बाद भारत दूसरा देश था जहां हार्ले-डेविडसन ने अमेरिका के बाहर असेंबली इकाई स्थापित की.

जिस हार्ले मोटरसाइकिल को अमेरिका से बनाकर भारत में बेचने पर 100 प्रतिशत (यानी मूल दाम से दोगुना) टैरिफ लगता था तो वहीं भारत में असेंबल करने भर से ही यह टैक्स 30 प्रतिशत हो जाता था. यह 30 प्रतिशत टैक्स भी इसलिए क्योंकि लगभग सभी बाइक पार्ट्स अमेरिका से भारत भेजे जाते थे और भारत में इन्हें बस असेंबल किया जाता था. हालांकि, असेंबली इकाई भारत में स्थापित होने के बाद भी हार्ले के कुछ मॉडल्स अमेरिका से इम्पोर्ट किए जाते थे.
साल 2018 में तब भी अमेरिकी राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप ने इसपर आपत्ति जताते हुए रेसिप्रोकल टैरिफ की बात कही यानी टैरिफ के बदले टैरिफ. तब भी भारत ने अपनी इम्पोर्ट ड्यूटी को 100 से 50 प्रतिशत कर दिया था और असेंबल की हुई मोटरसाइकिलों पर 30 के बदले 25 प्रतिशत टैरिफ कर दिया गया.
2018 में टैरिफ में कटौती के बावजूद हार्ले को कुछ खास फायदा नहीं हुआ. सितंबर 2020 में सुस्त मांग का हवाला देते हुए, कंपनी ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग और बिक्री बंद कर दी. हालांकि, हार्ले-डेविडसन ने हीरो मोटोकॉर्प के साथ पार्टनरशिप कर ली जिससे अभी भारत में इन दोनों कंपनियों के कोलैब से बनी बाइक्स बिकती हैं.
बिजनेस टुडे के सुमंत बनर्जी ने अपनी रिपोर्ट में भारत में हार्ले-डेविडसन की बाइक्स की बिक्री ना होने की कुछ वजहें बताईं. पहली बात तो भारतीय बाजार की जरूरतों से हार्ले-डेविडसन की मोटरसाइकिल मेल नहीं खाती है. सबसे बड़े दोपहिया बाजारों में से एक होने के बावजूद, भारत में मांग 150 सीसी से कम की सस्ती, छोटी कम्यूटर बाइक की है, न कि हार्ले की बड़ी और महंगी बाइक की. भारत में हार्ले की रेंज साढ़े-चार लाख से शुरू होकर 50 लाख तक जाती थी. इतनी महंगी कीमतों के कारण यह ज्यादातर भारतीयों के लिए दूर की कौड़ी बनकर रह गई थी.
हार्ले-डेविडसन को रॉयल एनफील्ड से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा, जो अधिक किफायती, हल्की और रखरखाव में आसान बाइक बना रही थी. एनफील्ड के नए मॉडल्स ने इसे भारत में क्रूजर बाजार का किंग बनाया जबकि हार्ले यह रफ़्तार नहीं पकड़ सकी.
KTM और BMW जैसे हार्ले के प्रतिस्पर्धियों ने बजाज और TVS जैसी भारतीय कंपनियों के साथ भागीदारी की, जो अमेरिकी मोटरसाइकिल कंपनी करने में नाकाम रही. छोटी बाइक बनाने के लिए चीनी कंपनी कियानजियांग के साथ इसने साझेदारी की मगर यह भारतीय बाजार के अनुकूल नहीं बैठा क्योंकि वे मॉडल भारत के बजाय मूलतः चीन के लिए डिज़ाइन किए गए थे.
अमेरिकी सड़कों को ध्यान में रखकर बनाई गई हार्ले-डेविडसन जब भारतीय सड़कों पर दौड़ी तो कभी इसका सस्पेंशन ख़राब हुआ, कभी ब्रेक फेल हुए तो कभी क्लच प्लेट जल गई. ग्राहकों को इसकी मेंटेनेंस महंगी तो लगी ही, साथ ही मरम्मत के लिए लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा था. इससे ब्रांड की विश्वसनीयता को भारत में नुकसान पहुंचा.
बजट - 2025 में क्या चर्चा हुई?
केंद्रीय बजट 2025-26 में, बाहर से आयात की जाने वाली 1,600 सीसी और उससे अधिक इंजन क्षमता वाली मोटरसाइकिल पर इम्पोर्ट ड्यूटी 40 से घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया और असेंबल मोटरसाइकिल पर पहले के 15 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया.

व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच चर्चा के बाद भारत-अमेरिका के संयुक्त बयान जारी किया. इसके मुताबिक, अमेरिका ने बर्बन व्हिस्की, मोटरसाइकिल, और अमेरिकी रुचि के अन्य उत्पादों पर टैरिफ कम करने के भारत के फैसले का स्वागत किया और साथ ही अमेरिकी कृषि उत्पादों और चिकित्सा उपकरणों के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने के उपायों को भी सराहा. भारत ने अमेरिका में भारतीय आमों और अनार के निर्यात को बढ़ाने के लिए अमेरिका की ओर से उठाए गए कदमों की भी सराहना की. दोनों पक्षों ने बढ़ाकर द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के लिए आपसी सहयोग की भी बात कही.
अब हार्ले-डेविडसन कंपनी का भारत में लौटना नजदीकी भविष्य में तो संभव नहीं लगता. हालांकि मोटरसाइकिल को खरीदने की चाह रखने वाले अब भी मोटा दाम देकर इस बाहर से इम्पोर्ट करवा सकते हैं.