मुगलिया सल्तनत के छठे बादशाह औरंगजेब भारत के सबसे बदनाम राजाओं में एक खास, लेकिन अनचाही जगह रखता है. आम जनमानस का एक बड़ा तबका औरंगजेब को एक कठोर इस्लामी दमनकर्ता के रूप में देखता है जो भारत की हर चीज, खासकर हिंदुओं से नफरत करता था.
औरंगजेब के बारे में और भी धारणाएं प्रचलित हैं मसलन, वो संगीत से हद दर्जे की नफरत करता था, उसने लाखों हिंदुओं का नरसंहार किया और हजारों मंदिरों को नष्ट किया. लेकिन अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के की किताब 'औरंगजेब: द मैन एंड द मिथ' ऐसी कई धारणाओं को तोड़ने का प्रयास करती है.
ट्रुश्के की किताब में एक दिलचस्प किस्सा भी दर्ज है जब एक कवि ने अपनी व्यंग्यात्मक कविता से बादशाह औरंगजेब को भी नहीं बख्शा. लेकिन आम धारणा के उलट औरंगजेब ने उसे कोई सजा नहीं दी, उलटे उसके इनाम की राशि बढ़ा दी थी. आगे इस किस्से का विस्तार से वर्णन है.
ट्रुश्के अपनी किताब में लिखती हैं कि अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' नीति के तहत औरंगजेब के बारे में कई ऐसी भ्रांतियां फैलाईं कि वो एक धार्मिक उन्माद से प्रेरित क्रूर शासक था, और जिसने लाखों हिंदुओं का नरसंहार किया और हजारों मंदिरों को नष्ट किया.
बाद के सैकड़ों वर्षों में कई टिप्पणीकारों ने भी बेहद कमजोर सबूतों के आधार पर औरंगजेब को एक कट्टर और क्रूर शासक के रूप में पेश करने का मिथक फैलाया, जिसे समाज के एक बड़े तबके ने आत्मसात कर लिया.
ट्रुश्के लिखती हैं कि बेशक, औरंगजेब निर्दोष नहीं था. उसने कुछ ऐसे काम किए जो आज के लोकतांत्रिक, समतावादी और मानवाधिकार मानकों पर खरे नहीं उतरते. लेकिन कुछ ऐसी बातें भी हैं जो कम चर्चित लेकिन ऐतिहासिक रूप से अहम हैं.
जैसे, आलोचक यह तो जोर-शोर से कहते हैं कि औरंगजेब ने मंदिरों को नष्ट किया, लेकिन यह स्वीकार नहीं करते कि उसने कई आदेश हिंदू मंदिरों की रक्षा के लिए भी जारी किए और ब्राह्मणों को वजीफे और जमीनें प्रदान की थी.
ट्रुश्के लिखती हैं कि औरंगजेब ने उन धार्मिक संस्थानों और नेताओं के खिलाफ कठोर एक्शन लेने में संकोच नहीं किया, जिन्हें वह विद्रोही या अनैतिक मानता था. लेकिन जब ऐसी कोई चिंता नहीं होती थी, तो औरंगजेब ने खुद को सभी भारतीयों का न्यायप्रिय शासक मानते हुए मंदिरों को राज्य सुरक्षा प्रदान की.
आलोचक यह तो कहते हैं कि औरंगजेब ने होली के उत्सव पर कुछ प्रतिबंध लगाए, लेकिन यह नहीं बताते कि उसने मुहर्रम और ईद के त्योहारों पर भी पाबंदी थोपी थी. वे इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं कि औरंगजेब ने सेहत संबंधी मामलों में हिंदू संतों से सलाह-मशविरा किया और अपने प्रशासन में किसी भी पूर्ववर्ती मुगल शासक की तुलना में अधिक हिंदुओं को नियुक्त किया.
ट्रुश्के अपनी किताब में लिखती हैं आमतौर पर यह माना जाता है कि औरंगजेब ने अपने पूरे साम्राज्य में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया था. यह एक गलतफहमी है जिसे कैथरीन शॉफिल्ड जैसे विद्वानों ने ठीक किया है लेकिन अभी तक यह आम जागरूकता में नहीं आया है.
दरअसल, औरंगजेब ने अपने दरबार में ही कुछ खास तरह के संगीत पर पाबंदी लगाई थी. शायद अधिक दिलचस्प बात यह है कि औरंगजेब ने व्यंग्य कविता पर बैन नहीं लगाया, जो उस समय एक लोकप्रिय शैली हुआ करती थी.
वो किस्सा जब औरंगजेब ने अपना मजाक उड़ाने वाले कवि को इनाम दिया
ट्रुश्के की किताब 'औरंगजेब: द मैन एंड द मिथ' में वो किस्सा कुछ यूं दर्ज है कि एक बार एक कवि ने सल्तनत के ही एक अधिकारी कामगार खान पर एक भद्दा व्यंग्य लिखा. असल में, कामगार खान ने दूसरी शादी कर ली थी और कवि ने उसी पर अपना व्यंग्य बाण चलाया था.
व्यंग्य से नाराज कामगार खान बादशाह औरंगजेब के दरबार में फरियाद लेकर पहुंचा. उसने बादशाह से इसमें दखल देने की गुजारिश की. हालांकि औरंगजेब ने तब जो कहा, वो आज की उसकी प्रचलित छवि से बिल्कुल मेल नहीं खाती.
औरंगजेब का जवाब था, "उसी कवि ने मुझे अपने व्यंग्यों में नहीं बख्शा था; बदले में मैंने उसका इनाम भी बढ़ा दिया था, ताकि वह ऐसा दोबारा न करे; फिर भी इस एहसान के बावजूद उसने अपनी ओर से व्यंग्य कम नहीं किया."
औरंगजेब ने तब याचिका खारिज कर दी थी, और अपने गुमान में आहत कामगार खान को सलाह देते हुए कहा, "हमें अपनी भावनाओं को दबा देना चाहिए और सद्भाव से रहना चाहिए."