GDB सर्वे : भारतीयों की कथनी-करनी का लेखा-जोखा

इंडिया टुडे के हालिया GDB (सकल घरेलू व्यवहार) सर्वे के नतीजे बताते हैं कि ज्यादातर भारतीयों की कथनी-करनी में जमीन आसमान का अंतर है. जैसे 85 फीसद लोग बस-ट्रेन में बिना टिकट सफर को गलत मानते हैं लेकिन भारतीय रेलवे में ही 2023-24 में बिना टिकट यात्रा के 3.6 करोड़ मामले दर्ज हुए

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर ठोस इरादों के साथ देश तेज कदम तो बढ़ा रहा है, लेकिन एक असहज सचाई यकीनन काले धब्बे की तरह साबित हो सकती है और वह है हमारी आधी-अधूरी नागरिक चेतना.

देश चाहे 2030 तक 70 खरब डॉलर या करीब 581 लाख करोड़ रुपए के अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तैयारी में जुटा हो लेकिन उसका सामाजिक ताना-बाना ऐसी किसी प्रगति का संकेत नहीं देता.

देश कहां खड़ा है, इसके आकलन के लिए इंडिया टुडे ग्रुप ने डेटा एनालिटिक्स फर्म हाउ इंडिया लिव्ज के साथ मिलकर 21 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 98 जिलों में अपनी तरह का पहला जनमत सर्वेक्षण किया. इस सर्वेक्षण में 9,188 लोगों से उनकी आय या संपत्ति के बारे में नहीं बल्कि शालीन व्यवहार, हमदर्दी और नेकनीयती के बारे में बातचीत की गई, जिसे हम सकल घरेलू व्यवहार (जीडीबी) कह रहे हैं.

और नतीजे बिल्कुल भी खुश करने वाले नहीं हैं. 61 फीसद लोग काम करवाने के लिए घूस देने को तैयार हैं; 52 फीसद लोग करों से बचने के लिए नकद लेन-देन को सही बताते हैं; 69 फीसद लोग मानते हैं कि घर के मामलों में अंतिम फैसला पुरुषों का ही होना चाहिए; और देश की तकरीबन आधी आबादी अंतर-धार्मिक या अंतर-जातीय विवाह के खिलाफ है. सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश में आर्थिक बेहतरी के साथ-साथ नागरिक आचार-व्यवहार, समानता और सामाजिक जिम्मेदारी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है.

दरअसल देश की वैश्विक आर्थिक महत्वाकांक्षा और उसकी घरेलू आचार-व्यवहार की वास्तविकता के बीच चौड़ी खाई को भांपकर ही इंडिया टुडे को ऐसा विशेष जनमत सर्वेक्षण करने की प्रेरणा मिली. भले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'विकसित भारत' का वादा और नजरिया दोहराते हों, लेकिन सच्चे विकास की राह सिर्फ जीडीपी के आंकड़ों और इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं से नहीं बनाई जा सकती.

विकसित राष्ट्र का दर्जा पाने के सफर में न सिर्फ आर्थिक बदलाव की जरूरत है, बल्कि आचार-व्यवहार या तौर-तरीकों में क्रांति की भी दरकार है, जो समावेशी विकास, नियम-कानूनों के प्रति आदर, स्त्री-पुरुष समानता और नागरिक जवाबदेही को बढ़ावा दे सके.

ये कहीं और से सीखे हुए कोई विदेशी या पराए मूल्य नहीं हैं, बल्कि ये आदर्श देश के संविधान में गहरे गुथे हुए हैं. 42वें संविधान संशोधन के जरिए लाए गए अनुच्छेद 51ए में हर नागरिक के मौलिक कर्तव्यों को निर्धारित किया गया है. ये देश के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के लिए तय किए गए नैतिक दायित्व हैं.

ये कर्तव्य धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय भावनाओं से ऊपर उठकर सद्भाव और समान भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करने, हिंसा से दूर रहने, 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए पढ़ाई अनिवार्य करने और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा तथा सुधार का आह्वान करते हैं. यानी देश में जिस आचार-व्यवहार क्रांति की दरकार है, उसकी कल्पना उसके संस्थापक दस्तावेज में पहले से ही की गई है. हमें बस उसे अमली जामा पहनाने की जरूरत है.

कोई सिंगापुर की मिसाल से सीख सकता है. वह देश कुछ दशकों में ही तीसरी दुनिया से पहली दुनिया की महाशक्ति बन गया. उसका यह कायापलट न सिर्फ चतुर आर्थिक नीतियों का नतीजा था, बल्कि नागरिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी में इजाफे का भी परिणाम था. इसी तरह, भ्रष्टाचार में बुरी तरह फंसे देश से चोटी की अर्थव्यवस्था तक दक्षिण कोरिया का उदय या जापान में औद्योगिक उछाल लाने वाला द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नागरिक अनुशासन, इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि जिम्मेदाराना सामाजिक आचार-व्यवहार न सिर्फ वांछनीय, बल्कि जरूरी है.

मानव विकास सूचकांक में ऊंचे पायदान पर खड़े दूसरे देशों—स्वीडन, जापान और जर्मनी—में सार्वजनिक जिम्मेदारी की मजबूत संस्कृति भी है. स्विट्जरलैंड को देखें, जहां सार्वजनिक परिवहन के समय से घड़ी की सुई मिला सकते हैं और किराया न देना पराया विचार सरीखा है. यह अमल कराने के कुशल तंत्र का आईना नहीं, बल्कि एक सामाजिक भरोसा है जो निजी तौर-तरीकों को सामाजिक व्यवहार से जोड़ता है.

प्रधानमंत्री मोदी लगातार स्वच्छ भारत मिशन और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे बदलावकारी अभियानों से सामूहिक जिम्मेदारी के संदेश को आगे बढ़ाते रहे हैं. इंडिया टुडे सकल घरेलू व्यवहार जनमत सर्वेक्षण का मकसद हमारे समाज को आईना दिखाना है, और देश को सच्चे विकास के बहुआयामी सफर के साथ सामूहिक प्रगति पर विचार करने का मौका मुहैया करना है.

वांछित सामाजिक व्यवहार की खातिर राज्यों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करने के लिए सर्वेक्षण में उनकी रैंकिंग चार प्रमुख पैमानों पर उनके नजरिए के आधार पर की गई है: नागरिक शिष्टाचार (सामुदायिक गतिविधियों में भागीदारी तथा सार्वजनिक नियमों के पालन का आकलन); सार्वजनिक सुरक्षा (कानून में भरोसा तथा निजी सुरक्षा की धारणाओं को मापना); स्त्री-पुरुष प्रवृत्तियां (स्त्रियों की भूमिका और समानता का मूल्यांकन); और, विविधता तथा भेदभाव (जाति, धर्म तथा क्षेत्रीयता से संबंधित पूर्वाग्रहों की जांच-परख).

चारों पैमानों पर मिले नतीजे हमें भौगोलिक विविधता वाले समाज के संक्रमण के दौर का आईना मुहैया कराते हैं, जहां पारंपरिक मूल्य आधुनिकीकरण के आवेगों के साथ सह-अस्तित्व में हैं. प्रगतिशील केरल से लेकर परंपरा-पूजक उत्तर प्रदेश तक क्षेत्रीय विविधताएं बताती हैं कि देश में नागरिक आचार-व्यवहार की हकीकतें कई हैं, जिनमें हरेक की अलग-अलग विकास संबंधी सचाइयां हैं. खुशकिस्मती यह है कि सुधार की भावना और ठोस इरादों में इजाफा हो रहा है. मसलन, उत्तर प्रदेश विधानसभा में पान मसाला थूकने की घटना के एक दिन बाद अध्यक्ष ने परिसर में गुटखा और पान मसाला पर प्रतिबंध लगा दिया, उल्लंघन करने वालों पर 1,000 रुपए का जुर्माना लगाया.

विडंबना यह है कि समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता के मुताबिक, सर्वेक्षण ने लंबे समय से चली आ रही इस धारणा को पलट दिया है कि देश में नागरिक तौर-तरीकों की कमियां गैर-जानकारी से उपजी हैं, जिससे उचित सार्वजनिक व्यवहार पर व्यापक जागरूकता फैलाने की जरूरत है. इसके बजाए, नतीजे बताते हैं कि ज्यादातर लोग पहले से ही जानते-समझते हैं कि क्या सही है, लेकिन उसके मुताबिक व्यवहार नहीं करते.

सर्वेक्षण के आंकड़ों से यह पता चलता है कि 85 फीसद लोग बस-ट्रेन वगैरह में बिना टिकट सफर को गलत मानते हैं. फिर भी, भारतीय रेलवे में ही 2023-24 में बिना टिकट यात्रा के 3.6 करोड़ मामले दर्ज हुए, जिसकी वजह से 2,231.74 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया.

कूड़ा-कचरा फैलाने, बिना टिकट यात्रा या स्त्री-पुरुष गैर-बराबरी के खिलाफ व्यक्त विचारों और व्यवहार में भारी फर्क जागरूकता के बजाए अमल करवाने वाले तंत्र की नाकामी को दर्शाता है. इसलिए, असली चुनौती नैतिकता का पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना है, लोगों को उन बातों का पालन करने के लिए मजबूर करना है, जिन्हें वे मानते या कहते हैं. ऐसे अमल करने को बाध्य करने की दुनिया में काफी मिसालें हैं.

आप कम्युनिस्ट चीन का जितना भी मजाक उड़ाएं, लेकिन 1980 के दशक में उसने प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को सार्वजनिक स्थानों पर थूकने वाले वयस्कों को शर्मिंदा करने के लिए प्रेरित किया. न्यूयॉर्क शहर में 1986 में सार्वजनिक परिवहन में थूकना गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था, जिसके उल्लंघन पर गिरफ्तारी का सामना करना पड़ सकता था.

सर्वेक्षण में दूसरे चिंताजनक पैटर्न भी सामने आए हैं: मसलन, काम करवाने के लिए घूस देने की तैयारी. ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक, डेनमार्क, फिनलैंड, सिंगापुर और न्यूजीलैंड दुनिया के सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देश हैं. हालांकि उनकी संयुक्त आबादी भारत के पंजाब के बराबर है, लेकिन वे प्रति व्यक्ति आय के मामले में शीर्ष 25 देशों में शुमार हैं, जिसमें सिंगापुर और डेनमार्क का स्थान शीर्ष 10 में है. यह उनकी आर्थिक सफलता की वजह संयोग भर नहीं है, बल्कि पारदर्शी व्यवस्थाएं लेन-देन की लागत कम करती हैं, निवेश को बढ़ावा देती हैं और आश्वस्त करती हैं कि संसाधन अपने इच्छित गंतव्य तक पहुंचे.

डिजिटल भुगतान क्रांति यह अंदाजा देती है कि नागरिक व्यवहार किस तरह तेजी से बदल सकता है. 76 फीसद लोग अब नकदी के बजाए डिजिटल भुगतान को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें दिल्ली 96 फीसद के साथ सबसे आगे है. वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता को लेकर लोगों का यह रवैया स्वीडन के अनुभव के समान है, जहां 2023 में नकद लेन-देन देश के जीडीपी का सिर्फ 1 फीसद था. डिजिटल लेन-देन अपनाकर स्वीडन ने न सिर्फ व्यापार-कारोबार को आधुनिक बनाया है, बल्कि उससे कर चोरी भी कम हुई है, भ्रष्टाचार घटा है और ऐसी वित्तीय प्रणाली बनी है जिसमें पारदर्शिता खुद-ब-खुद है.

शायद विकास और आचार-व्यवहार का संबंध स्त्री-पुरुष नजरिए में सबसे साफ और ज्यादा है. विश्व आर्थिक मंच ने लगातार पाया है कि स्वीडन और कनाडा जैसे उच्च स्त्री-पुरुष समानता वाले देशों में प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है और सामाजिक कल्याण के संकेतक मजबूत होते हैं. सर्वेक्षण में विरोधाभासों का पता चलता है जो भारत में महिला कार्यबल के पूरी तरह उपयोग न हो पाने की कहानी बयान करता है.

93 फीसद लोगों का मानना था कि बेटियों को बेटों के समान पढ़ाई-लिखाई का मौका मिलना चाहिए और 84 फीसद लोग  महिलाओं को घर से बाहर नौकरी करने के हक में हैं, ये प्रगतिशील नजरिए पितृसत्तात्मक अंतर्धाराओं के साथ मौजूद हैं. 69 फीसद लोग अभी भी मानते हैं कि पुरुषों को बड़े घरेलू मामलों में अंतिम फैसला लेना चाहिए. 83 फीसद ने कहा कि पति का पत्नी को पीटना उचित नहीं है, लेकिन 14 फीसद महिलाओं का मानना इसके उलट था, जो पितृसत्तात्मक मूल्यों के गहरे पैठने की ही मिसाल है. यह सिर्फ सांस्कृतिक ही नहीं, आर्थिक मजबूरी का भी मसला है.

नॉर्डिक देशों—डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड—ने अपनी उल्लेखनीय समृद्धि आंशिक रूप से आर्थिक और राजनैतिक जीवन में महिलाओं के पूर्ण भागीदारी के जरिए हासिल की है. नॉर्वे में 2003 में कॉर्पोरेट बोर्डों में 40 फीसद महिला प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया, तो निंदकों ने आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी की थी. इसके उलट, नॉर्वे की फर्मों में बेहतर व्यवस्था और वित्तीय प्रदर्शन दिखा, जो स्त्री-पुरुष समानता को अपनाने वाली अर्थव्यवस्थाओं में साफ देखा गया.

भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर लगभग 41 फीसद है, जो चीन (60 फीसद) और अमेरिका (58 फीसद) से काफी नीचे है. 2018 में मैकिन्जी ऐंड कंपनी के अध्ययन का अनुमान है कि भारत की जीडीपी 27 फीसद तक बढ़ सकती है, बशर्ते देश अपने महिला कार्यबल भागीदारी को पुरुषों के बराबर बढ़ा दे.

सार्वजनिक सुरक्षा का मामला कानून पर अमल के मुद्दे से कहीं ज्यादा बड़ा है; इससे आर्थिक गतिविधि भी तय होती है. पर्यटक, कारोबारी और निवेशक ऐसा माहौल पसंद करते हैं जहां वे सुरक्षित महसूस करें. सिंगापुर और स्विट्जरलैंड जैसे कम अपराध दर वाले देश लगातार सबसे अमीर देशों में शुमार हैं और वैश्विक पर्यटकों के लिए लोकप्रिय गंतव्य बने हुए हैं.

सर्वेक्षण से यह जरूर पता चलता है कि 86 फीसद लोग सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षित महसूस करते हैं, लेकिन स्त्री-पुरुष पूर्वाग्रह का खौफ बना रहता है. शहरी भारत में सुरक्षा को लेकर महिलाओं की सीमित आवाजाही आर्थिक अवसर के मद में भारी कीमत वसूलती है.

जापान को लें. वहां महिलाएं किसी भी समय सार्वजनिक स्थानों पर बेखटके आ-जा सकती हैं. यह सुरक्षा ढांचा सीधे आर्थिक हिस्सेदारी में तब्दील हो जाता है. महिलाएं सुरक्षा की फिक्र किए बगैर बेखटके देर रात तक काम कर सकती हैं, शाम की कक्षाओं में पढ़ाई कर सकती हैं, या सामाजिक आयोजनों में हिस्सा ले सकती हैं. इससे उनके लिए विकल्प खुले रहते हैं. सुरक्षा का आर्थिक लाभ इतना बड़ा है कि मैकिन्जी ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्त्री समानता को बढ़ावा देने से 2025 तक क्षेत्र के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद में 45 खरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है, जो सामान्य की तुलना में 12 फीसद की वृद्धि है.

एक और चौंकाऊ आंकड़ा देखें. 84 फीसद लोगों का दावा है कि वे हिंसक अपराध की रिपोर्ट थाने में दर्ज करेंगे. फिर भी दिल्ली जैसे शहरों में, एफआईआर दर्ज किए जाने की दर बेहद कम है (सिर्फ 7.2 फीसद ही औपचारिक रूप से चोरी जैसे अपराधों की रिपोर्ट दर्ज करते हैं). यह विसंगति व्यवस्था में भरोसे की कमी का संकेत देती है, जिसे ठीक नहीं किया गया तो लोगों की सामाजिक हिस्सेदारी से परहेज करते रहेंगे.

सर्वेक्षण का शायद सबसे बड़ा खुलासा विविधता और भेदभाव वाले मामलों से संबंधित नतीजे हैं. हालांकि इसमें लगातार कायम चुनौतियों के साथ-साथ सुधार का भी पता चलता है. 70 फीसद लोग पड़ोस में दूसरे धर्म के लोगों के साथ कोई दिक्कत महसूस नहीं करते, तो 60 फीसद रोजगार के अवसरों में धार्मिक भेदभाव का विरोध करते हैं. यह वाजिब दिशा में उत्साहजनक प्रगति है. वैश्विक 'इनोवेशन सिटीज इंडेक्स' से पता चलता है कि विविध समुदायों के सह-अस्तित्व वाले लंदन, दुबई और टोरंटो जैसे शहर लगातार दुनिया के सबसे नए और आर्थिक रूप से जीवंत केंद्रों में शुमार हैं. इन शहरों में विभिन्न नजरिए के लिए खुलेपन से उद्यमशीलता और रचनात्मक क्रियाकलाप के लिए उर्वर जमीन तैयार हुई है.

सबसे चौंकाने वाला तथ्य तो अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाहों का कड़ा विरोध है. 61 फीसद लोग अंतर-धार्मिक शादी के खिलाफ हैं और 56 फीसद अंतर-जातीय विवाह विरोधी. यह सिर्फ व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं है, यह उन गहरे सामाजिक दरारों को दर्शाता है जिनके आर्थिक निहितार्थ भी गहरे हैं.

अर्थशास्त्री पारंपरिक विकास मॉडल की सीमाओं को पहचान रहे हैं, तो यह सर्वेक्षण अधिक समग्र समझ बनाने की ओर इशारा करता है. किसी देश का विकास सिर्फ नीतियों या आर्थिक ढांचों से तय नहीं होता. यह सड़कों, स्कूल-कॉलेजों, सार्वजनिक परिवहन की कतारों और घरों में आकार लेता है, जहां स्त्री-पुरुष भूमिकाओं पर बातचीत की जाती है.

या शायद किसी स्टेडियम में. जैसा कोपेनहेगन में 2021 की गर्मियों में हुआ. मेजबान डेनमार्क और फिनलैंड के बीच यूईएफए यूरो फुटबॉल मैच के दौरान डेनमार्क के स्टार मिडफील्डर क्रिश्चियन एरिक्सन दिल का दौरा पड़ने से बेहोश हो गए. लेकिन कोई घबराहट या अफरा-तफरी नहीं फैली. इसके बजाए, प्रशंसकों ने मेडिकल टीमों के काम करने के दौरान उनकी निजता की रक्षा के लिए मानव शृंखला बना डाली. स्टेडियम के बाहर, डेनिश लोग चुपचाप जमा थे, उनके चेहरों पर तमाशा देखने की ललक के बजाए चिंता साफ झलक रही थी. वह ऐसा पल था जिसमें डेनिश समाज में निहित गहरी नागरिक चेतना जाहिर हुई, ऐसा समाज जो लगातार दुनिया के सबसे खुशहाल और आर्थिक रूप से सबसे सफल समाजों में एक है.

वह घटना आर्थिक संकेतकों या विकास पैमानों से संबंधित नहीं लगती, लेकिन अमीर देशों के अदृश्य सामाजिक ताने-बाने को बताती है. यह ऐसे समाज का आईना है, जिसमें भरोसा, जिम्मेदारी और समानता कोई अमूर्त धारणा नहीं बल्कि आर्थिक जीवन में व्याप्त व्यवहार हैं. भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, तो इंडिया टुडे जीडीबी सर्वेक्षण यादगार नुस्खे की तरह काम कर सकता है कि प्रगति सिर्फ ऊपर से आई नीतियों से नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की पसंद से बने जमीनी बदलाव से होती है.

सर्वेक्षण का तरीका

इंडिया टुडे ग्रुप ने हाउ इंडिया लिव्ज (एचआईएल) के साथ मिलकर देश भर में सामाजिक और व्यक्तिगत व्यवहारों का अध्ययन करने के लिए देश में पहला 'सकल घरेलू व्यवहार' जनमत सर्वेक्षण किया.

> इसके तहत 21 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 98 जिलों में 9,188 लोगों से बातचीत की गई.

> उनमें 50.8 फीसद पुरुष और 49.2 फीसद महिलाएं थीं.

> इसी तरह 54.4 फीसद शहरी और 45.6 फीसद ग्रामीण लोगों को जोड़ा गया.

कोई भी एक पैमाना भिन्न-भिन्न सामाजिक और व्यक्तिगत व्यवहारों को पूरी तरह पकड़ नहीं सकता, इसलिए सर्वेक्षण में कई सारे सवालों को निम्न चार व्यापक पैमाने पर तैयार किया गया:

> नागरिक शिष्टाचार (सामुदायिक गतिविधियों में हिस्सेदारी, सार्वजनिक नियमों का पालन)—12 सवाल

> सार्वजनिक सुरक्षा (कानून में विश्वास, निजी सुरक्षा के बारे में धारणाएं)—6 सवाल

> स्त्री-पुरुष का नजरिया (स्त्री भूमिकाओं और बराबरी के बारे में विचार) 7 सवाल

> विविधता और भेदभाव (जाति, धर्म, या क्षेत्रीयता पर आधारित पूर्वाग्रह)—5 सवाल

कुल 30 सवाल पूछे गए, जिनमें शहरी और ग्रामीण लोगों के लिए भिन्नताएं थीं. राज्यों को इन पैमानों पर और समग्र रैंक देने के लिए दो सूचकांक बनाए गए, जिसके लिए नीचे लिखी प्रक्रिया अपनाई गई:

सवालों के अंक

हर सवाल के अंक की गणना करने के लिए सर्वे में शामिल सभी लोगों के अलग-अलग जवाबों को जोड़कर पहले तय किया गया कि कितने-कितने फीसद लोगों ने किस विकल्प (पूरी तरह सहमत, कुछ हद तक सहमत, कुछ हद तक असहमत, पूरी तरह असहमत) को चुना. उसके बाद हर सवाल के अंकों की गणना करने के लिए इन जोड़े गए जवाबों—न कि अलग-अलग जवाबों—का इस्तेमाल नीचे लिखे भारण सूत्रों में किया गया. फिर हर सवाल को इस आधार पर वर्गीकृत किया गया कि सहमति या असहमति सकारात्मक जवाब दर्शाती थी या नहीं.

जहां जवाबों ने सकारात्मक व्यवहार दर्शाया, उसके प्रतिशत को इस तरह भारित किया गया जिससे उनके संख्याबल की झलक मिले. मसलन, ''क्या परिवार में बेटियों को पढ़ाई के लिए उतना ही प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जितना बेटों को?'' इस पर 'पूरी तरह सहमत' कहने वालों के प्रतिशत को 1 अंक का पूर्ण भारांक दिया गया, जबकि ''कुछ हद तक सहमत'' कहने वालों के प्रतिशत को 0.3 अंक का कम भारांक दिया गया, ताकि उनके प्रबल विश्वासों को प्राथमिकता देते हुए आंशिक सहमति को मान्यता दी जा सके. हर सवाल के अंतिम अंकों की गणना इस सूत्र का प्रयोग करके की गई: (1 म पूरी तरह सहमत कहने वालों का प्रतिशत) + (0.3 म कुछ हद तक सहमत कहने वालों का प्रतिशत). इस तरह समग्र सूचकांक में पक्की राय रखने वालों का अधिक प्रभाव आश्वस्त हुआ.

इसी तरह उन सवालों के लिए जहां अधिक जवाब असहमति का था, अंकों में असहमति के प्रतिशतों का इस्तेमाल किया गया ताकि वह सवाल की इच्छित दिशा के अनुरूप हो. मसलन, पत्नी को पीटना सही नहीं है, इसमें ''पूरी तरह सहमत'' कहने वालों के प्रतिशत को 1 अंक का पूर्ण भारांक दिया गया, जबकि ''कुछ हद तक सहमत'' कहने वालों को 0.3 अंक का कम भारांक दिया गया. इससे यह तय हुआ कि आंशिक असहमति का ध्यान रखकर अंतिम अंक में अवांछनीय व्यवहारों के प्रबल विरोध का अधिक प्रभाव झलके.

पैमाना सूचकांक हर सवाल के लिए:

> सवाल के अंकों को सामान्यीकरण तकनीक का प्रयोग करके सभी राज्यों के अधिकतम और निम्नतम अंकों पर आधारित 0-1 के पैमाने में बदला गया

> हर सामान्यीकृत अंक को उसके पैमाने के भीतर बराबर भारांक मिले (1/एन, जिसमें एन सवालों की संख्या है)

> भारित सामान्यीकृत अंकों को जोड़कर पैमाना सूचकांक बनाया गया

> फिर जनसंख्या भारांशों का मिला-जुला इस्तेमाल करके ग्रामीण और शहरी सूचकांकों की गणना अलग-अलग की गई, मसलन, (ग्रामीण पैमाना सूचकांक म ग्रामीण आबादी का प्रतिशत) + (शहरी थीम सूचकांक म शहरी आबादी का प्रतिशत).

समग्र सूचकांक

कुल समग्र सूचकांक इस तरह बनाया गया:

> हर सवाल को और हर सवाल के भीतर हर पैमाने को बराबर भारांश देकर (पैमाना सूचकांक की तरह)

> ग्रामीण और शहरी लोगों के लिए सवालों के सभी भारित अंकों को जोड़ा गया

> इन ग्रामीण और शहरी समग्र सूचकांकों को जनसंख्या भारांशों का इस्तेमाल करते हुए मिलाकर: (ग्रामीण यौगिक म ग्रामीण आबादी का प्रतिशत) + (शहरी यौगिक म शहरी आबादी का प्रतिशत).

राज्यों को रैंक इस तरह दी गई

इन सूचकांकों के आधार पर राज्यों को हर पैमाने के लिए अलग-अलग और साथ ही सभी अलग-अलग सामाजिक संकेतकों में उनके समग्र प्रदर्शन को दर्शाने वाली संयुक्त रैंकिंग में भी रैंक दी गई. उच्चतर सूचकांक मूल्य सामाजिक रूप से ज्यादा सकारात्मक जवाबों को इंगित करते हैं, जिसका नतीजा बेहतर रैंकिंग रहा. सभी सूचकांक मूल्यों और बीच के अंकों का कोई अंतर्भूत अर्थ नहीं है, क्योंकि वे अधिकतम और न्यूनतम पर आधारित राज्यों के सापेक्ष मूल्य हैं. इसलिए हम केवल रैंक का क्रम प्रकाशित कर रहे हैं और सूचकांक मूल्य प्रकाशित नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनका गलत अर्थ लगाया जा सकता है.

सीमाएं

> नमूने के सीमित आकार और सर्वे की जटिल डिजाइन के नतीजतन अधिक अंतर (कम सटीकता) वाले अनुमान प्राप्त हुए, इसलिए पूर्ण अनुमानों की तुलना में रुझान अधिक विश्वसनीय हैं

> सवालों का चयन उस संस्था के नजरिए को दर्शाता है जिसे यह काम सौंपा गया

> सहमति या असहमति 'सकारात्मक' जवाब है या नहीं, यह तय करने में सापेक्ष निर्णय की भूमिका है

> भारांश विकल्प (पैमाने और सवालों के लिए बराबर भारांश, 'कुछ हद तक' वाले जवाबों के लिए 0.3 भारांक) स्वाभाविक रूप से सापेक्ष हैं

> सूचकांक मूल्य पूर्ण होने के बजाए सापेक्ष हैं, जिससे रैंकिंग वास्तविक अंकों से ज्यादा अर्थपूर्ण हो गई है.

किस राज्य में कैसा सामाजिक शिष्टाचार

यह रैंकिंग बताती है कि 30 विभिन्न सवालों के जवाब के आधार पर 21 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश का प्रदर्शन कैसा है. ये सवाल चार प्रमुख पैमानों—नागरिक व्यवहार, सार्वजनिक सुरक्षा, स्त्री-पुरुष सोच, और विविधता/भेदभाव—के इर्दगिर्द तैयार किए गए. जिन राज्यों में इन पैमानों पर बेहतर व्यवहार या प्रवृत्तियों की मानिंद अधिक सकारात्मक सामाजिक जवाब मिले, उन्हें ऊंचे अंक दिए गए.

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