ऑफिस में तनाव कैसे बन रहा जानलेवा! क्या है बचने का तरीका?
भारतीय कंपनियों में गैर-सेहतमंद कार्य-संस्कृति से कर्मचारियों की जान पर बन आई है. इससे वे तरह-तरह की मानसिक और शारीरिक बीमारियों की चपेट में आ रहे और कई मौकों पर तो यह कल्चर उनके लिए मौत का सबब बन रही

जापानी में एक शब्द है - करोशी, यानी काम के बोझ से मौत. भारत में हाल में ऐसी एक त्रासदी से साबका पड़ा. सितंबर में एक परेशान मां ने अपनी बेटी के बॉस को चिट्ठी लिखकर उस "कार्य संस्कृति" की लानत-मलामत की "जो काम का बेहिसाब महिमामंडन करती है और काम करने वाले इंसानों की कतई परवाह नहीं करती."
उनका यह गुस्सा जवान बेटी, प्रतिभाशाली चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) ऐना सेबेस्टियन पेरायिल की जान जाने से उपजा था. ऐना वैश्विक लेखा और परामर्श फर्म ईवाई की सहयोगी एसआर बाटलीबॉय में अपने 'ड्रीम जॉब' में चार महीने दिन-रात जुटे रहने के बाद अचानक घर पर गिर पड़ीं और प्राण त्याग दिए. वे सिर्फ 26 साल की थीं.
ऐना की मां ने लिखा, "काम के बोझ, नए माहौल और देर तक लगातार कई-कई घंटे काम करने से वह शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से टूट गई. नौकरी जॉइन करने के फौरन बाद उसे बेचैनी, अनिद्रा और तनाव ने घेर लिया, लेकिन वह खुद को जैसे-तैसे खींचती रही, यह मानकर कि कड़ी मेहनत और लगन ही कामयाबी की कुंजी है...लगातार मांग बढ़ाते जाना और अवास्तविक उम्मीदों को पूरा करने का दबाव झेलकर जिंदा रह पाना कतई संभव नहीं, और इससे इतनी संभावनाओं वाली एक लड़की जान से हाथ धो बैठी."
बेचैनी, अनिद्रा, तनाव...इनसे आज देश में अनेक कामगारों का वास्ता है. सबसे बढ़कर तो जेन जी या 1995 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी इसे बुरी तरह झेल रही है. ऑनलाइन इमोशनल वेलनेस प्लेटफॉर्म योरदोस्त के 2023 में 2,000 से ज्यादा कर्मचारियों के सर्वे में पाया गया कि 60.1 फीसद भारी तनाव से ग्रस्त हैं, जो 2022 के मुकाबले 30.3 फीसद ज्यादा है. तनाव का असर 21-30 वर्ष आयु वर्ग में सबसे ज्यादा है. इस आयु वर्ग के 64.4 फीसद ने भारी तनाव झेलने की शिकायत की, जबकि 41-50 वर्ष आयु वर्ग में यह आंकड़ा 53.6 फीसद था.
यह तनाव सेहत पर भारी पड़ने लगा है. युवाओं में दिल के दौरे आम हो गए हैं. 2021 में एन्वायरनमेंट इंटरनेशनल जर्नल में छपे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के शोध से पता चला है कि 2016 में लंबे घंटों तक काम करने के कारण 194 देशों में 7,45,194 लोगों की दिल के दौरे और दिमागी स्ट्रोक से मौत हो गई, जो 2000 से 29 फीसद ज्यादा है.
अध्ययन में बताया गया है कि जो लोग हर हफ्ते 55 घंटे या उससे ज्यादा काम करते हैं, उनमें स्ट्रोक होने का 35 फीसद और दिल के दौरे से मरने का 17 फीसद ज्यादा खतरा होता है, जबकि हर हफ्ते 35-40 घंटे काम करने वालों में ऐसा नहीं होता.
तनाव का असर शरीर पर ही नहीं, दिमाग पर भी भारी होता है, जिससे बेचैनी, लाचारी का भाव, लगातार थकान, अवसाद और यहां तक कि आत्महत्या के विचार भी पैदा होते हैं. मनोवैज्ञानिक और परामर्श संस्था रेजिलिएंसवर्क्स की संस्थापक-निदेशक करुणा बासकर कहती हैं, "इसे रबड़ बैंड की तरह समझें. अगर आप ज्यादा लंबा खींचते हैं, तो यह टूट जाएगा."
शायद ऐसा ही कुछ उत्तर प्रदेश के झांसी में बजाज फाइनेंस के कर्मचारी 42 वर्षीय तरुण सक्सेना के साथ हुआ. उन्होंने 30 सितंबर को आत्महत्या कर ली. उनके सुसाइड नोट में लिखा था, "मैं 45 दिनों से सोया नहीं हूं. मैं थोड़ा-कुछ ही खा पाया हूं. मैं भारी तनाव में हूं. सीनियर मैनेजर मुझ पर हर हाल में लक्ष्य पूरा करने या नौकरी छोड़ने का दबाव बना रहे हैं."
उसी दिन बैंक मैनेजर 40 वर्षीय सुशांत चक्रवर्ती ने कथित तौर पर मुंबई में अटल सेतु से छलांग लगा दी. उनकी पत्नी ने मौत के लिए उनके सरकारी बैंक में काम के दबाव को जिम्मेदार ठहराया.
देश के दफ्तरों में इतना तनाव क्यों?
लोग हमेशा कड़ी मेहनत करते आए हैं, कड़ी मेहनत करना कोई समस्या नहीं. कोई भी सबसे अच्छा काम तब दिखाता है जब उसे चुनौती मिलती है; बिल्कुल तनाव न होने से कर्मचारी बुझे-से और चलताऊ काम करने लग सकते हैं. बासकर कहती हैं, "समस्या तब बन जाती है जब बर्दाश्त करने की क्षमता चूक जाती है." भारत में अमेरिका की सिलिकॉन वैली से 'उठो और जुट जाओ' या 'फटाफट करो' की कार्य-संस्कृति की नकल पहले आईटी कंपनियों में और फिर बाकी जगहों पर की गई.
हाल में इन्फोसिस के सह-संस्थापक और पूर्व सीईओ नारायण मूर्ति ने अफसोस जताया कि देश के युवा "पश्चिम से अवांछित आदतें अपना लेते हैं. मेरा अनुरोध है कि हमारे युवाओं को कहना चाहिए- 'यह मेरा देश है. मैं हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहता हूं.' द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मन लोगों और जापानियों ने यही किया था."
और देखिए, नतीजे में जापान को करोशी मिला. लंबे घंटों तक काम करना आज भी देश में उत्पादकता का पैमाना है और उसे अंजाम देना आदर्श माना जाता है. एडटेक कंपनी अनएकेडमी के डिजाइन के सीनियर वाइस-प्रेसिडेंट हार्दिक पंड्या ने मार्च 2023 में ट्वीट किया, "जो कहते हैं कि आपको वीकेंड में काम नहीं करना चाहिए, उन्होंने शायद कभी यह नहीं चखा कि अद्भुत काम क्या है."
सो, आश्चर्य नहीं कि आईएलओ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत उन देशों में दूसरे स्थान पर है, जहां लंबे घंटों तक काम करने वाले लोगों का फीसद सबसे ज्यादा है. 51 फीसद से ज्यादा भारतीय कर्मचारी हर हफ्ते 49 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, हफ्ते में पांच दिन करीब 10 घंटे. अब ऑफिस की ड्यूटी शुरू या खत्म करने का कोई तय समय नहीं. 24*7 वाली संचार तकनीक की बदौलत कर्मचारी को हमेशा फोन या ईमेल से चिपके रहना पड़ता है. मेंटल हेल्थ फर्स्ट एड इंडिया की प्रशिक्षक देविका धर्मराज कहती हैं कि हर मैसेज का फटाफट जवाब देने की बॉस की उम्मीद से तनाव और गहरा जाता है.
डिवाइस के आपस में जुड़ने के साथ दुनिया जुड़ गई. अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र के उभार से भारतीय कंपनियां बाकी दुनिया की जरूरतों को पूरा करने लगीं, लोगों को पालियों में और अलग-अलग टाइम जोन के हिसाब से काम करने के लिए रखा गया. एचआर सोल्यूशंस फर्म सीआइईएल एचआर के सीईओ और प्रबंध निदेशक आदित्य मिश्र बताते हैं कि डेडलाइन बाहरी ताकतें, खासकर क्लाइंट तय करने लगे और यह गैर-वाजिब था, जिससे कंपनियों के पास काम का शेड्यूल तय करने की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई.
यह खासकर क्लाइंट-सर्विसिंग कंपनियों के मामले में हुआ, जो आईटी और आईटीईएस, कंसल्टेंसी, मार्केटिंग, एकाउंटिंग और कानून जैसे क्षेत्रों में काम कर रही थीं. दिल्ली में रहने वाले 30 वर्षीय कंसल्टिंग प्रोफेशनल करण शर्मा (बदला हुआ नाम) बताया कि वे सुबह 9 बजे लॉग इन करते और दोपहर 3 बजे तक अपने हांगकांग मुख्यालय में सहकर्मियों के साथ काम किया करते. "हमेशा, हर दिन हम लंच, यहां तक कि पानी भी नहीं पी पाते क्योंकि हमेशा काम पूरा करने की हड़बड़ी होती." उसके बाद, वे अगले दिन की रिपोर्ट तैयार करते, जो अक्सर आधी रात खत्म होती. वे कहते हैं, "रात 12 बजे या 1 बजे लॉग आउट करना आम बात थी."
लक्ष्य आधारित बिक्री और निवेश बैंकिंग जैसे काम भी उतने ही चुनौतीपूर्ण बन गए हैं. ऐसे कर्मचारियों पर लक्ष्य पूरा करने का दबाव बना रहता है, अक्सर क्लाइंट मीटिंग के लिए बाहर जाना पड़ता है और आर्थिक मंदी के दौरान अधिक तनाव झेलना होता है. कभी-कभी कर्मचारी विषाक्त वातावरण की भी शिकायत करते हैं. मैनेजर अपनी कुंठाएं नीचे के कर्मचारियों पर डाल देते हैं, जवाबदेही लेने से इनकार करते हैं, या कड़वे बोल बोलते हैं.
सो, आश्चर्य नहीं कि भारतीय उद्योग परिसंघ और डिजिटल हेल्थकेयर प्लेटफॉर्म मेडीबडी ने इस जुलाई में 1,000 कंपनियों के सर्वेक्षण की संयुक्त रिपोर्ट जारी की, जिसमें पाया गया कि 62 फीसद कर्मचारी काम से संबंधित तनाव से ग्रस्त हैं और बुझ-से गए हैं या बर्नआउट हैं. यह आंकड़ा वैश्विक औसत 20 फीसद से तीन गुना ज्यादा है. धर्मराज कहती हैं, "हम जीवित शरीर हैं, लेकिन हम खुद के साथ मशीनों जैसा सलूक कर रहे हैं."
डेल कार्नेगी ट्रेनिंग इंडिया की चेयरपर्सन और प्रबंध निदेशक पल्लवी झा कहती हैं कि बीच के मैनेजरों में बर्नआउट सबसे ज्यादा हैं. वे शीर्ष मैनेजमेंट की रणनीति और उस पर अमल के बीच की कड़ी हैं, और उन्हें न केवल नई तकनीक में खुद को पारंगत करना होता है और यह आश्वस्त करना होता है कि शीर्ष मैनेजमेंट के विजन पर अच्छे से अमल हो, बल्कि अपनी टीम की प्रेरणा और मनोबल को भी बनाए रखना है. इसका मतलब यह नहीं कि शीर्ष मैनेजमेंट बेफिक्र रहता है.
सीआइईएल एचआर के मिश्र कहते हैं, "टेक्नोलॉजी बिजनेस मॉडल में बदलाव ला रही है, माहौल न सिर्फ होड़ का है, बल्कि अनिश्चित भी, मुनाफे पर बहुत ज्यादा जोर है. ऊपर वालों को न सिर्फ कारेबार चलाना है, बल्कि यह भी देखना है कि वे अगले 2-3 दशकों तक प्रासंगिक बने रहें."
युवा ज्यादा बर्नआउट हैं
लेकिन जेन ज़ी और मिलेनियल्स (1981 और 1995 के बीच जन्मे) जैसा दबाव किसी और पर नहीं है. बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और फटाफट हासिल करने की फितरत के चलते वे कम उम्र में ही मैनेजर बन रहे हैं. उद्योग निकाय नैसकॉम के एक सर्वेक्षण में पता चला कि टेक कंपनियों में 90 फीसद से ज्यादा कर्मचारी मिलेनियल्स और जेन ज़ी पीढ़ी के हैं. वे न केवल तेजी से ऊपर चढ़ रहे हैं, बल्कि उतनी ही तेजी से कंपनियां भी बदल रहे हैं.
इन्फोसिस के पूर्व ग्रुप एचआर प्रमुख कृष्णमूर्ति शंकर कहते हैं कि प्रतिभाओं के आने-जाने के तेज सिलसिले से कंपनियों में मैनेजरों का कार्यकाल छोटा हो गया है. टीमें फटाफट अदल-बदल जाती हैं, हर समय कई नए लोग होते हैं. शंकर कहते हैं, "इससे मैनेजरों के बीच आपसी रिश्तों और दीर्घकालिक सोच की कमी होती है." यह खासकर कोविड के दौर में हाइब्रिड यानी घर और दफ्तर दोनों से काम की व्यवस्था के बाद काफी हो गया है. घर से काम करने वाले कर्मचारी अक्सर अनदेखे-अनसुने रहते हैं.
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर पले-बढ़े जेन ज़ी और कुछ हद तक मिलेनियल्स में बेचैनी, खुद को नुक्सान पहुंचाने की प्रवृत्ति और संबंधित विकार देखे गए हैं, जो पिछली पीढ़ियों में नहीं थे. सामाजिक मनोवैज्ञानिक जोनाथन हैड्ट ने अपनी हालिया पुस्तक द ऐंग्शस जेनरेशन में यही निष्कर्ष निकाला है. उन्होंने विस्तार से बताया कि 'खेलकूद कर बड़े हुए बच्चों' के बजाए 'फोन आधरित बच्चों' में जोखिम लेने, डर पर काबू पाने, चुनौतियों से निबटने और गहरे रिश्ते बनाने की क्षमता काफी घट गई है.
शंकर कहते हैं कि यह प्रवृत्ति भारत में भी फैल रही है, जहां कार्यबल में आने वाले कमजोर बालिग युवाओं में अक्सर आज के भारी दबाव वाले काम के लिए जरूरी लचीलेपन की कमी होती है.
दोस्तों और परिवार के स्वाभाविक मददगार तंत्रों का टूटना भी संकट पैदा कर रहा है. धर्मराज कहती हैं, "हमें खुश रहने के लिए सामाजिक संबंधों, दोस्ती और भाईचारे की जरूरत होती है, लेकिन लोग 10-12 घंटे काम करने में बिताते हैं, साथ ही 2-3 घंटे आने-जाने में बिताते हैं, जिससे आराम करने या रिश्तों और निजी हितों का ध्यान रखने के लिए समय ही नहीं बचता."
तनाव का शरीर पर क्या असर होता है
काम की डेडलाइन या किसी मीटिंग के खौफ से जब भी किसी को तनाव होता है, तो एक स्वाभाविक आदिम प्रतिक्रिया 'भागो या लड़ो' की होती है. सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. एस.पी. ब्योत्रा बताते हैं कि इस वजह से कुछ तनाव जनित हॉर्मोन और एंजाइम का स्राव होता हैं, जैसे कोर्टिसोल, लिपिड, ट्राइग्लिसराइड्स (रक्त में वसा), हिस्टामाइन, एड्रिनेलिन और यहां तक कि लैक्टिक एसिड का भी.
बकौल उनके, अगर लगातार लड़ने या भागने की प्रतिक्रिया होती रहती है, तो शरीर तनाव के प्रति ज्यादा प्रतिक्रिया करना शुरू कर देता है, जिससे रक्तप्रवाह में तनाव जनित हॉर्मोन और एंजाइम जमा हो जाते हैं. अधिक मात्रा में जमा होने पर ये विषाक्त हो सकते हैं, जिससे विभिन्न अंगों, खासकर दिल पर दबाव पड़ता है. इसलिए, कोई महीनों काम से लदा हुआ है, हर हफ्ते अतिरिक्त घंटे काम कर रहा है, तो वह सोमवार की सुबह से डरना शुरू कर सकता है, यहां तक कि काम कम होने पर, या दफ्तर पहुंचते ही थकावट महसूस कर सकता है.
डॉ. ब्योत्रा कहते हैं, "अगर शरीर मनोवैज्ञानिक तनाव में रहता है, तो समय के साथ, यह रोग में बदल सकता है." इसलिए, समय पर काम पूरा करने के लिए शरीर में दौड़ता एड्रिनेलिन थकावट पैदा कर सकता है. शरीर को आराम, रिचार्ज होने और नींद लेने के लिए समय की जरूरत होती है. लंबे घंटों तक काम करने से 7-8 घंटे की नींद की बुनियादी जरूरत भी पूरी नहीं हो पाती.
23 साल के अनुभव वाले आईटी पेशेवर रोहिन बसु (बदला हुआ नाम) याद करते हैं कि एक कम्प्यूटेशनल टेक्नोलॉजी कंपनी की पहली नौकरी में मैनेजर ने उनसे रात भर काम करवाया, जबकि वे बीमार थे. वे कहते हैं, "हर दिन औसतन 12 घंटे काम करने होते थे, और यह दो साल तक चला. आखिरकार मुझे नर्वस ब्रेकडाउन हो गया."
तनाव के लक्षण कई तरह से दिखने लगते हैं. माइग्रेन या सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, दिल की धड़कन बढ़ना, अपच, मांसपेशियों या जोड़ों में दर्द, त्वचा पर दाने, भूख न लगना या अधिक खाना, नींद न आना और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं. चिड़चिड़ापन या स्वभाव गुस्सैल भी हो सकता है, मन उदास रहने लग सकता है, कहीं ध्यान नहीं लगता और हर समय खुद को दबा हुआ महसूस कर सकता है.
गैलप की 2024 की रिपोर्ट, 'स्टेट ऑफ द ग्लोबल वर्कप्लेस' में 160 देशों के 1,28,278 कर्मचारियों का सर्वेक्षण किया गया. उसमें पाया गया कि भारत में करीब 1,000 कर्मचारियों में 35 फीसद को हमेशा गुस्सा आता है और 42 फीसद में 'दिन भर' उदासी छाई रहती है. दुनिया में यह औसत क्रमश: 21 फीसद और 22 फीसद है. यानी भारत में काफी ज्यादा है.
तनाव लोगों में भरोसा और आत्मसम्मान में कमी लाता है, जिससे वे कम काम कर पाते हैं, और जिम्मेदारियों के प्रति बेपरवाह हो जाते हैं. कुछ लोग अलग-थलग पड़ने लगते हैं, सहकर्मियों और मैनेजरों से आंख चुराते हैं, नकारात्मक सोच वाले हो जाते हैं.
आर्टेमिस हॉस्पिटल्स में मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान के मनोचिकित्सक तथा प्रमुख सलाहकार डॉ. राहुल चंडोक बताते हैं कि इससे अक्सर लोग बुरी आदतें पाल लेते है. वे कहते हैं, "वे अक्सर धूम्रपान और ज्यादा शराब पीने लगते हैं, जिससे दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है."
काम के तनाव से कैसे निबटें
डॉ. ब्योत्रा कहते हैं कि कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए सबसे अच्छा यह कर सकती हैं कि उन्हें हर दिन उचित नींद, व्यायाम, पोषण और आराम मिले. उनके शब्दों में, "यह धारणा ही गलत है कि सप्ताह के दिन काम के लिए हैं और सप्ताहांत आराम के लिए. सेहत के मामले को इस तरह हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता." काम के दिनों में ही लोगों को आराम और तरोताजा होने की गुंजाइश होनी चाहिए.
कंपनियों को यह भी समझना चाहिए कि वे मुनाफे की दौड़ में मशगूल थीं, तभी दुनिया बदल गई. इसे लांग कोविड के रूप में सोचें. महामारी के बाद की दुनिया में लोगों की खासकर जेन ज़ी और मिलेनियल्स की काम से अपेक्षाएं काफी हद तक बदल गई हैं. अब काम को ही जिंदगी नहीं, बल्कि जिंदगी का एक हिस्सा भर माना जाता है. अब सैर-सपाटा, परिवार, अलग-अलग अनुभव लेना भी उतना ही अहम हो गया है.
उनके माता-पिता को बुनियादी जरूरतों—भोजन, घर, सुरक्षा—के लिए जूझना पड़ता था. उनसे उलट आज के युवाओं के पास ऐसी मजबूरियां नहीं हैं. उनके लिए काम बस पैसा कमाने का एक जरिया है. योरदोस्त के पुनीत मनुजा कहते हैं, "वे जिंदगी का बड़ा मकसद तलाशते हैं, और काम सिर्फ उसका एक हिस्सा भर है. गिग इकोनॉमी, स्टैंड-अप कॉमेडी और फ्रीलांसिंग में लगे लोगों की बढ़ती संख्या को देखें. उन्हें पूर्णकालिक नौकरी के मासिक वेतन की सुरक्षा की दरकार नहीं है."
कर्मचारियों ने काम के शोषणकारी माहौल के खिलाफ आवाज भी उठानी शुरू कर दी है और वे अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में ज्यादा जागरूक हो रहे हैं. इसी तरह कंपनियां भी महसूस कर रही हैं. आदित्य बिरला एजुकेशन ट्रस्ट और उसकी मानसिक स्वास्थ्य पहल एमपावर की संस्थापक चेयरपर्सन नीरजा बिरला कहती हैं, "ज्यादा कंपनियां मानसिक सेहत के बारे में सचेत हो रही हैं मगर यह काफी नहीं है. यह रुझान बढ़ना चाहिए."
कंपनियां स्वास्थ्य लाभ, उचित मुआवजे और काम तथा जिंदगी के संतुलन को समझते हुए कल्याण रणनीतियां नए सिरे से बना रही हैं. उन्हें कर्मचरियों में तनाव पर गौर करना चाहिए. अगर लंबे समय तक चिंता, तनाव या दो हफ्ते से ज्यादा मन उदास रहता है तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
सीआईआई-मेडीबडी सर्वे रिपोर्ट में पाया गया कि 72 फीसद नौकरी चाहने वालों के लिए कर्मचारी कल्याण कार्यक्रम की अहमियत है, जो हर किसी की खुशहाली के उपायों और दफ्तर में स्वास्थ्य सेवा सुलभ कराने की बढ़ती मांग को दर्शाता है.
ज्यादातर बड़ी कंपनियों ने परामर्श सेवाओं, हेल्पलाइन और कल्याण अवकाश नीतियों समेत मानसिक स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना शुरू कर दिया है. मसलन, वैश्विक होम फर्निशिंग ब्रांड आइकिया अपने 3,500 कर्मचारियों के लिए स्वस्थ और सुरक्षित कार्य माहौल बनाने के लिए एक पूर्णकालिक स्वास्थ्य और कल्याण अधिकारी को नियुक्त करता है. बैटरी बनाने वाली कंपनी अमरा राजा के पास अपने 17,000 से ज्यादा कर्मचारियों की खुशहाली का ध्यान रखने के लिए आठ सदस्यों की एक टीम है, इसके अलावा 29 सीनियर मैनेजरों और 294 पर्यवेक्षकों का एक सहायता नेटवर्क है, जो भावनात्मक खुशहाली को बढ़ावा देने के लिए परामर्श, टकराव टालने के उपायों में प्रशिक्षित है.
मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग सहायता भी जरूरी मान ली गई है. अमरा राजा, आइकिया और आरपीजी जैसी कंपनियां हफ्ते में 2-3 बार मौके पर काउंसलर उपलब्ध कराती हैं, साथ ही परिवार के सदस्यों के लिए ऑनलाइन सेवाएं भी उपलब्ध हैं. लोग इनका लाभ भी उठाने लगे हैं.
अमरा राजा ग्रुप में प्रेसिडेंट (ग्रुप एचआर) जयकृष्ण बी कहते हैं, "चार या पांच साल पहले, जब हमने दफ्तर में काउंसलर बैठाने की शुरुआत की थी, तो शायद ही कोई उसके पास जाता था. लेकिन अब काउंसलिंग चाहने वाले लोगों की संख्या में साल-दर-साल 15-20 फीसद की वृद्धि हो रही है, जिससे पता चलता है कि कर्मचारी कंपनी में अपनी चिंताएं साझा करना सुरक्षित मानते हैं." आज तक कर्मचारियों ने 4,500 काउंसलिंग सत्रों का उपयोग किया है, जिनमें 1,800 ऑफलाइन और बाकी ऑनलाइन थे.
कई क्षेत्रों में सक्रिय आईटीसी समूह मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर मोटापा, दफ्तर का तनाव, अवसाद और काम के बोझ के प्रबंधन जैसे विभिन्न स्वास्थ्य विषयों पर मासिक वेबिनार आयोजित करता है. उसके कॉर्पोरेट एचआर प्रमुख अमिताभ मुखर्जी का कहना है कि उसमें 1,200 से ज्यादा लोग शामिल होते हैं. दूसरी कंपनियों ने अपने-अपने तरीके तैयार किए हैं. मैरिको के सीएचआरओ अमित प्रकाश कहते हैं कि उपभोक्ता उत्पाद कंपनी कई औपचारिक और अनौपचारिक फोरम, त्रैमासिक सर्वेक्षण, स्किप-लेवल मीटिंग और पर्यवेक्षकों के साथ बैठकों का आयोजन करती है, ताकि कर्मचारी चिंताएं खुलकर व्यक्त कर सकें.
आइकिया में एक आरामदायक बिस्तर वाला 'शांत कमरा' भी है जहां कर्मचारी आराम कर सकते हैं और तरोताजा हो सकते हैं. आइकिया इंडिया की कंट्री पीपल ऐंड कल्चर मैनेजर परिणीता सेसिल लाकड़ा कहती हैं, "हम लचीला कॉन्ट्रैक्ट भी मुहैया कराते हैं. यानी कोई चाहे तो 40 घंटे के बदले 32 घंटे या अंशकालिक काम करे और जब हालात सुधरें तो फिर नियमित हो जाए." इसी प्रकार, आरपीजी ग्रुप अपने सभी कर्मचारियों को 50 फीसद काम घर से काम करने की इजाजत देता है.
अगुआ स्थापित करें मिसाल
कंपनियों को यह भी लग रहा है कि ऐसी पहल में ऊपर के लोग शिरकत नहीं करते, तो वह बेकार है. इसलिए, बकौल लाकड़ा, आइकिया के ऊपरी पांत के अधिकारी खुलकर अपनी छुट्टी की बातें करते हैं और दूसरों को अपनी अर्जित छुट्टियों का इस्तेमाल करने की सलाह देकर उदाहरण स्थापित करते हैं. वे बताती हैं, "कंपनी में सभी स्तरों पर लोग 85 फीसद तक अपनी छुट्टियों का इस्तेमाल करते हैं."
कैपिलरी टेक्नोलॉजीज के संस्थापक और सीईओ अनीश रेड्डी खुद मानसिक स्वास्थ्य और योग रिट्रीट आयोजित करने की पहल का नेतृत्व करते हैं, जिससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि कंपनी वास्तव में अपने कर्मचारियों की भलाई की परवाह करती है. रेड्डी बताते हैं, "हम हर साल बेंगलूरू के बाहरी इलाके में दो ऐसे रिट्रीट आयोजित करते हैं और उनमें 100 से ज्यादा कर्मचारी भाग लेते हैं." कंपनी कर्मचारियों को विपश्यना ध्यान के दस दिन के कोर्स के लिए उनकी वार्षिक छुट्टी के अलावा 11 दिन की छुट्टी देती है. रेड्डी खुद भी हर साल यह कोर्स करते हैं.
लेकिन इन कोशिशों के अलावा कंपनियों को अपने ढांचे पर विचार करने की दरकार है. इसका क्या मतलब कि वे कर्मचारियों पर अवास्तविक लक्ष्य पूरा करने का दबाव बनाएं और फिर उन्हें इससे निबटने के लिए काउंसलिंग दें. इसके बजाए, यह तय करना चाहिए कि नौकरी की भूमिकाएं और संसाधन कैसे बांटे जाएं, क्योंकि उससे काम का बोझ और काम के घंटे तय होते हैं. डेल कार्नेगी ट्रेनिंग इंडिया की पल्लवी झा कहती हैं, "लंबे घंटों तक काम करने का मतलब बिलाशक यह है कि कंपनी अपनी मानव पूंजी में पर्याप्त निवेश नहीं कर रही, और काम का बोझ साझा करने के लिए पर्याप्त लोग नहीं हैं."
मसलन, वे बताती हैं कि बिक्री टीम को कमाई बढ़ाने पर जोर देने को कहा गया, तो एक बिक्री सहायता टीम बनाई गई. इस टीम ने उससे जुड़े बाकी काम संभालना शुरू किया, तो बिक्री टीम का समय बच गया. इतना ही अहम मैनेजरों को प्रशिक्षण देना भी है, क्योंकि वे अपनी टीमों के लिए काम करने का तरीका तैयार करते हैं. आरपीजी ग्रुप के चीफ टैलेंट ऑफिसर सुप्रतीक भट्टाचार्य बताते हैं कि सीएक्सओ वगैरह एचआर प्रमुख के साथ संवाद सत्र में बैठते हैं और फिर सीएचआरओ बाकी के लिए ऐसी ही बैठक आयोजित करता है.
कर्मचारियों की भलाई का ध्यान न रखना घाटे का सौदा भी है. डेलॉइट के 2022 के सर्वेक्षण, 'कार्यस्थल में मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण' से पता चला है कि भारतीय कंपनियों को कर्मचारियों की गैर-हाजिरी, कम उत्पादन और छोड़ जाने से अनुमानित सालाना 14 अरब डॉलर (1.18 लाख करोड़ रु.) का नुक्सान होता है. दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए यह सही तो नहीं है.
- 49 घंटे हर हफ्ते 51 फीसद से ज्यादा भारतीय कर्मचारियों को काम में जुटे रहना पड़ता है. यह आईएलओ का ताजा आंकड़ा है. इससे भारत दुनिया में लंबे घंटों तक काम के मामले में दूसरे स्थान पर है.
- 62 फीसद कर्मचारियों ने, सीआईआई और मेडीबडी के 1,000 कंपनियों के एक सर्वे में, काम से जुड़े तनाव और थकान की शिकायत की.
- 1.3 गुना ज्यादा स्ट्रोक का खतरा उनमें होता है, जो हफ्ते में 55 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, बनिस्बत उनके जो मानक घंटों तक काम करते हैं. ऐसा डब्ल्यूएचओ-आईएलओ का एक अध्ययन कहता है.
- 14 अरब डॉलर सालाना भारतीय कंपनियों को नुक्सान उठाना पड़ता है कर्मचारियों की खराब मानसिक सेहत की वजह से. डेलॉइट की 2022 की एक रिपोर्ट का आकलन.