अडोलेसेंस : इस क्रिएटिव जीनियस की चर्चा अनुराग कश्यप और चेतन भगत के बिना क्यों अधूरी है!

नेटफ्लिक्स पर हालिया स्ट्रीम हुई ब्रिटिश सीरीज़ 'अडोलेसेंस' के बारे में दुनिया भर के फ़िल्मकार बात कर रहे हैं और दर्शक इसे ख़ूब सराह रहे हैं. तेरह साल के बच्चे की इस कहानी में ऐसा क्या है?

(बाएं) अनुराग कश्यप (बीच में) अडोलेसेंस का एक सीन और (दाएं) चेतन भगत
(बाएं) अनुराग कश्यप (बीच में) अडोलेसेंस का एक सीन और (दाएं) चेतन भगत

'असल जादू तब होता है जब कहानी बुनियादी सवालों से परे चली जाती है...' भारत के सबसे महान फ़िल्मकार और विश्व सिनेमा के दिग्गज निर्देशक सत्यजीत रे की इस बात के कई सिरे हैं. अपने जिस इंटरव्यू में उन्होंने ये बात कही उसमें रे कहानी की तहों पर बात कर रहे थे. किसी क्राइम थ्रिलर का मूल तत्व क्या होता है? कि अपराध किसने किया. इस तरह की फ़िल्मों के लिए बाक़ायदा 'who done it' की कैटेगरी बनाई गई है.

लेकिन जैसे-जैसे कहानी 'कौन?' से ऊपर उठते हुए 'क्यों?' की बात करने लगती है, उसी कहानी के भीतर एक और कहानी घटने लगती है. नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही वेब सीरीज़ 'अडोलेसेंस (adolescence) ' इसी तहेतर कहानी का एक जबरदस्त नमूना है. शायद यही वजह है कि दुनिया भर के फ़िल्मकार इस सीरीज़ को अनदेखा नहीं कर पाए और अब लगातार इस पर बात कर रहे हैं.

क्या है कहानी?

महज़ चार एपिसोड और 228 मिनट की ये मिनी सीरीज (वाक़ई में मिनी) बिना किसी भूमिका के पहले फ्रेम से आपको कहानी के भीतर ले जाती है. पुलिस हत्या के एक आरोपी को पकड़ने उसके घर पहुंचती है. आरोपी के स्क्रीन पर पहली बार दिखने से ही पता चल जाता है कि आप कोई साधारण क्राइम ड्रामा नहीं देख रहे, क्योंकि आरोपी 13 साल का एक लड़का है. शुरुआत में दर्शक को (ख़ासकर हिंदी के दर्शक को) लगेगा कि मामला निपटाने के लिए एक आम बच्चे को सिस्टम की भेंट चढ़ाने का परंपरागत पुलिसिया संस्कार निभाया जा रहा है. 

लेकिन कुछ ही मिनटों में जब बार-बार बच्चे को उसके अधिकार बताता लीड इन्वेस्टिगेटर, बेहद क़रीने से सुबूत खोजते पक्के प्रोफेशनल पुलिसवाले और बच्चे को बच्चे की तरह बरतती पुलिस टीम दिखाई देती है तो दिल से आह निकलती है, काश! इस प्रोफेशनलिज्म का दसवां हिस्सा भी हमारे राज्यों के पुलिस विभागों के हिस्से आया होता.

बहरहाल, चार एपिसोड की इस ब्रिटिश सीरीज को चार जगहों में बांटा गया है जो निर्देशक फिलिप बैरेंटिनी के उस विजन की वजह से है जिसमें वो एक ही कहानी को चार अलग नज़रियों से दिखाते हुए उनका असर मापना चाहते थे. एक हिस्से के बाद आप दोबारा उस जगह बतौर दर्शक नहीं लौटते. पुलिस स्टेशन, स्कूल, सायकोलॉजिकल असेस्मेंट और अंत में परिवार. एक नाबालिग लड़की को सात बार चाकू घोंपकर क्यों मारा गया? इसी सवाल की मद्धिम रौशनी में कहानी आपको दिमाग़, परिवार, समाज और सिस्टम के उन अंधेरे कोनों तक ले जाती है जहां आप कई बार हाथ छुड़ाकर नज़र फेर लेना चाहते हैं.

बेमिसाल एक्टिंग 

शब्द हमारी जेबों में पड़े सिक्कों की तरह होते हैं, कम लेकिन कीमती. उन्हें यूं ही ख़र्च करने से बचना चाहिए. जैसे आप फ़ेसबुक पर किसी कविता के लिए कमेंट करते हैं, अद्भुत! आपने अनजाने में अपना वो सिक्का ख़र्च कर दिया जो वाक़ई किसी अद्भुत दृश्य के लिए बचाया जाना चाहिए था. बारिश के बाद धुले आसमान में किसी अजान तारे की टिमटिमाहट के लिए आप ये शब्द ख़र्च सकते थे. इसलिए जब हम कहते हैं कि इस सीरीज़ की एक्टिंग बेमिसाल है, तो वाक़ई इस टक्कर की एक्टिंग आपने आख़िरी बार कब देखी थी, आपको याद करने में मुश्किल होगी.

13 साल के बच्चे जेमी की भूमिका में महज़ 15 साल के ओवेन कूपर (कपूर नहीं) ने जो पानी जैसा साफ़ शफ़्फ़ाफ़ काम किया है उसने अनुराग कश्यप समेत दुनिया भर के कई दिग्गजों को भौंचक कर दिया. अनुराग कश्यप के ही शब्दों में 'कूपर ने जिस तरह का डेब्यू किया है ये अगाध प्रतिभा और चमत्कार के दम पर ही हो सकता है...'

सीरीज़ में जेमी के पिता का किरदार निभाने वाले स्टीफ़न ग्राहम का करियर तीन दशक पुराना और कई यादगार भूमिकाओं के बावजूद इस एक सीरीज़ की वजह से अद्भुत कहलाएगा. टिमटिमाते तारे जैसा. गैंग्स ऑफ न्यूयॉर्क (2002) से लेकर पायरेट्स ऑफ दी कैरेबियन (2011) और दी आयरिशमैन (2019) से लेकर वेनम: दी लास्ट डांस (2024) तक फैले विशाल करियर में ग्राहम ने जो काम इस सीरीज़ में कर दिया है उसके सामने ख़ुद ग्राहम बौने नज़र आते हैं.

सीरीज़ के आख़िर में तीन मिनट के उस अभिनय के लिए कहा जा सकता है कि 'जादू के सामने जादूगर भी छोटा दिखाई देने लगता है'. इस सीरीज़ का अंतिम दृश्य उन कुछ अंतिम दृश्यों में से एक बन गया जिन्हें स्क्रीन के इतिहास में जगह मिलेगी, तो सिर्फ़ स्टीफ़न ग्राहम की वजह से. सायकोलॉजिस्ट ब्रियोनी की भूमिका में एरिन ने कमाल का काम किया है.

कोटरों की पड़ताल 

ऐसा रोज़ होता है जब हमारे आपके मोबाइल या सामने पड़े अख़बार में नाबालिगों से जुड़े अपराधों की ख़बरें होती हैं. ये वो ख़बरें हैं जिन्हें मीडिया और अख़बार के दफ़्तरों में कई दर्जन ख़बरों के बीच से चुना जाता है. अपनी-अपनी न्यूज़ वैल्यू की वजह से ये ख़बरें अलग-अलग मंचों पर जगह पाती हैं. एक नज़र से ज़्यादा की मोहताज इन ख़बरों को अक्सर ज़रूरी ध्यान की ख़ुराक मिलती नहीं है. 

लेकिन एक ऐसी ही घटना की परतें उतारने के लिए सीरीज़ को लिखने वाले जैक थॉर्न और स्टीफ़न ग्राहम (जो कि इस सीरीज़ के को क्रिएटर भी हैं) की तारीफ़ हो रही है. लिखाई की ख़ास बात देखिए कि इस पूरे मर्डर केस में कहीं भी ट्रेडिशनल मीडिया की मौजूदगी नहीं दिखाई गई है. बल्कि इसकी जगह ली है सोशल मीडिया और इन्स्टाग्राम ने. जेन ज़ी से और दो पीढ़ी आगे पहुंच चुके स्लैंग (खिचड़ी शब्द) और इमोजी को जिस तरह से कहानी में पिरोया गया है वो अपने आप में हैरान करने के लिए काफ़ी है.

वन शॉट टेक्नीक 

अभी तक आपने जो पढ़ा, ख़ासकर एक्टिंग के बारे में, उस पर बहुत वाजिब है कि आप सवाल उठाएं और कहें कि ऐसा भी क्या बेमिसाल काम किया है. लेकिन आप इन अभिनेताओं के अभिनय को जब इस तकनीक की रौशनी में देखेंगे तो बहुत मुमकिन है कि आप इनकी 'बेमिसालता' से सहमत हों. वन शॉट तकनीक सिनेमा मेकिंग की उस तकनीक को कहा जाता है जो ज़ाहिर तौर पर एक ही शॉट में शूट की जाती है.

पूरे सीन में कहीं कट नहीं लगता और आप जो भी कर रहे होते हैं वो फाइनल प्रोडक्ट के तौर पर दर्ज किया जा रहा होता है. निर्देशक फिलिप बैरेंटिनी ने ये पूरी सीरीज़ सिंगल शॉट में शूट की है. और इस विधा के लिए जो मुश्किलें होती हैं उनमें से एक है बेहिसाब तैयारी. भारतीय फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप इस सीरीज़ के लिए अपने इन्स्टा अकाउंट पर लिखते हैं, 'मैं अडोलेसेंस की पूरी टीम की उस मेहनत और तैयारी की कल्पना भी नहीं कर सकता जो उन्होंने इसलिए की, ताकि वो हर एपिसोड को सिंगल शॉट में फ़िल्मा सकें...'

अनुराग कश्यप की दुत्कार 

हर अच्छे काम के बाद सवाल उठता है कि ये हम क्यों नहीं कर सके. क्रिएटिव हल्कों में ऐसा अक्सर होता है. अनुराग कश्यप ने इस सीरीज़ पर अलग बहस छेड़ दी है. उन्होंने अपने हैंडल पर लिखा कि एक तरफ तो नेटफ्लिक्स पर अडोलेसेंस जैसे बेहतरीन शो आ रहे हैं लेकिन इंडिया में नेटफ्लिक्स इंडिया के रीढ़विहीन और भ्रष्ट अधिकारी भारत में नेटफ्लिक्स को घटिया शोज़ और फिल्मों के बोझ से दबाए चले जा रहे हैं.

अनुराग ने ललकार कर कहा कि नेटफ्लिक्स इंडिया में अगर दम हो तो ऐसा शो बनाकर दिखाए. नेटफ्लिक्स इंडिया की टीम पर अनुराग ने आरोप लगाते हुए कहा है कि अगर यही आइडिया (अडोलेसेंस का) लेकर हम नेटफ्लिक्स इंडिया के अधिकारियों से मिले होते तो उन्होंने साफ़ पल्ला झाड़ लिया होता, या कहते कि इसे नब्बे मिनट की फ़िल्म में बदल दो. कुल मिलाकर अनुराग कश्यप का कहना ये रहा कि जब तक भारत में नेटफ्लिक्स की लालफ़ीताशाही चलेगी हम 'अडोलेसेंस' जैसा शो नहीं बना सकते.

चेतन भगत का क्या कहना है?

'अडोलेसेंस' पर अनुराग कश्यप के आरोप अपनी जगह हैं, इस पर 'फाइव पॉइंट समवन' समेत चौदह बेस्ट सेलर उपन्यास लिख चुके और जिनकी तीन किताबों पर फ़िल्में बनीं (थ्री इडियट्स, टू स्टेट्स और काईपोछे), चेतन भगत ने इंडिया टुडे से कहा कि "इस सीरीज़ की बहुत चर्चा हो रही है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि आप अच्छा कंटेंट ना बनाए जाने का ठीकरा नेटफ्लिक्स के उन कर्मचारियों के ऊपर फोड़ सकते हैं जो वहां बैठे अपना काम कर रहे हैं."

चेतन ने आगे कहा, "आप 'छावा' के दर्शक को जबरन 'अडोलेसेंस' नहीं दिखा सकते, ये सबकी अपनी पसंद का मसला है और क्योंकि सिनेमा बनाने में बहुत पैसा लगता है इसलिए निर्माता हमेशा दर्शक की पसंद का ख्याल रखकर फैसले लेते हैं. मुझे लगता है अनुराग कश्यप समेत बहुत से डायरेक्टर ये बात समझने में चूक गए हैं."

और अंत में 

जैसा कि शुरुआत में कहा गया कि क्रिएटिव मामलों में ऐसा अक्सर होता है कि, कोई आइडिया आपको परेशान कर सकता है कि ऐसी कहानी हमारे सामने ही थी लेकिन हम इसे देख नहीं पाए. लेकिन जैसे एक पेड़ के साथ उसकी मिट्टी और हवा पानी का संदर्भ जुड़ा होता है, ठीक वैसे ही एक कहानी के साथ भी उसकी मिट्टी और हवा पानी का संदर्भ होता है, जिसके बिना वो कहानी सिर्फ़ ढांचा भर रह जाएगी. इसलिए अनुराग कश्यप की खीझ अपनी जगह जायज़ है, लेकिन लालफ़ीताशाही का क्या किया जा सकता है. ये सोचने का सही समय है.

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